बनारस की हवा सांस लेने लायक नहीं, खतरनाक स्तर से ऊपर पहुंचा वायु प्रदूषण
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शासन के निर्देश पर फरवरी में एडीएम सिटी की ओर से 14 विभागों को पत्र जारी कर प्रदूषण से निपटने के लिए कार्ययोजना मांगी गई थी लेकिन आलम ये है कि इस पत्र के बारे में ज्यादातर विभागों के अधिकारियों को जानकारी तक नहीं है।
नगर निगम से लेकर वीडीए, पीडब्ल्यूडी तक के जिम्मेदारों ने ऐसे किसी पत्र से अनभिज्ञता जताई है। शहर के वायु प्रदूषण का स्तर लगातार खतरनाक स्तर पर है। बीते दो महीनों की बात करें तो ज्यादातर दिन शहर का एयर क्वालिटी इंडेक्स 200 के ऊपर ही रहा है।
शहर की सड़कों पर प्रतिदिन दस लाख से अधिक वाहनों के चलते शहर में वायु प्रदूषण की स्थिति लगातार खराब हो रही है। इसके अलावा शहर में विकास कार्यों के चलते भी प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। इस वजह से शहर की हवा सांस लेने लायक नहीं रह गई है।
इसे देखते हुए शासन ने प्रदूषण का एक सर्वे कराया जिसमें वाराणसी सबसे प्रदूषित शहरों में रहा। इसे संज्ञान में लेते हुए ही शासन के निर्देश पर 14 विभागों (नगर निगम, पीडब्ल्यूडी, वीडीए, आरटीओ, यातायात पुलिस, इंडिया ऑयल, हिंदुस्तान पेट्रोलियम, भारत पेट्रोलियम, जिला उद्यान, जिला कृषि, नेशनल हाईवे एथॉरिटी, जिला उद्योग, रोडवेज) को पत्र लिखकर प्रदूषण नियंत्रण की कार्ययोजना मांगी।
बाहर मास्क लगाकर ही निकलें
इसी तरह न तो जिला उद्योग, जिला उद्यान और ना ही एनएचएआई को ही इस पत्र की जानकारी है जबकि कार्ययोजना बनाकर भेजने की मियाद भी बीत चुकी है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी घनश्याम का कहना है कि उन्हें एडीएम सिटी की ओर से कार्ययोजना की रिपोर्ट नहीं मिली है।
डॉ. जीएन श्रीवास्तव, टीबी, चेस्ट विभाग, बीएचयू का कहना है कि पर्यावरण प्रदूषण की वजह से बीमारी बढ़ती जा रही है। खुदाई के चलते धूल, वाहनों से निकलने वाला धुंआ, सेहत के लिए खतरनाक है।
धूल नाक और मुंह के रास्ते फेंफड़े में जाती है, जिससे फेंफड़े में संक्रमण होने का खतरा अधिक रहता है। अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया जाए तो स्थिति गंभीर हो जाती है। बाहर निकलते समय मास्क लगाकर ही निकलें।
शहर में दौड़ेंगी सीएनजी और इलेक्ट्रिक बसें
वाराणसी से शुरुआत के बाद प्रदेश के दूसरे महानगरों में भी सीएनजी और इलेक्ट्रिक बसों के संचालन की योजना रोडवेज प्रबंधन ने बनाई है। जानकारों के मुताबिक सीएनजी और इलेक्ट्रिक बसों से शहर में वायु और ध्वनि प्रदूषण में कमी आएगी। इन बसों का मेंटेनेंस खर्च भी कम आएगा।
लिए इन बसों के चलाने की तैयारी तेज हो गई है। अगले माह से शहर में सीएनजी का सब स्टेशन भी खुलने जा रहा है। इसके जरिए बसों को सीएनजी आसानी से उपलब्ध हो सकेगी। इस सिलसिले में गुरुवार को लखनऊ में रोडवेज के सभी क्षेत्रीय अधिकारियों की बैठक भी हुई।
सिटी बसों के नियमित संचालन और उसके सफर को और सुविधाजनक बनाने पर जोर दिया गया। इसमें वाराणसी के क्षेत्रीय प्रबंधक कपिल शर्मा ने पुरानी हो चुकी डीजल चालित बसों की जगह नई इलेक्ट्रिक और सीएनजी बसों के चलाने का सुझाव दिया।
इस पर प्रमुख सचिव ने सैद्धांतिक रूप से सहमति जताते हुए कहा कि अगले एक-दो माह में ही इसकी प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। मौजूदा समय वाराणसी रोडवेज के पास 130 सिटी बसें हैं। इनमें अधिकतर खस्ताहाल हैं।
एनजीटी को बताया यूपी में 64 नाले, अकेले बनारस में ही 70
यूपी में उन्नाव, बनारस होते हुए बलिया तक 64 नाले गंगा में गिरते हैं जबकि अकेले बनारस में गंगा में गिरने वाले छोटे-बड़े नालों की संख्या करीब 70 है। गंगा में गिरने वाले नालों के बारे में उत्तर प्रदेश जल निगम, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राष्ट्रीय गंगा सफाई मिशन (एनएमसीजी) के आंकड़ों में भी अंतर सामने आया।
गंगा में गिरने वाले नालों की आंकड़ेबाजी की हकीकत शहर के ही गंगा घाटों को देखकर पता की जा सकती है। आदिकेशव घाट से सामनेघाट के बीच छोटे-बड़े 70 नालों के जरिए तकरीबन 350 एमएलडी सीवेज यहां रोजाना गंगा में बहाया जाता है।
सीवेज शोधन की क्षमता बमुश्किल 100 एमएलडी की है। बनारस की तरह गंगा किनारे के दूसरे बड़े शहरों को मिला दिया जाए तो नालों का आंकड़ा कई गुना बढ़ जाएगा।