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Varanasi News: महाराष्ट्र के बाद काशी में शुरू हुई थी आंग्रे के बाड़े की सार्वजनिक गणेश पूजा
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आंग्रे का वाड़ा। फोटो स्टोरी
- फोटो : samvad
वाराणसी। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एकजुट होने के लिए बाल गंगाधर तिलक ने महाराष्ट्र में गणेशोत्सव की शुरुआत की। इसके बाद काशी में इसकी आवाज गूंजी और तिलक से प्रेरित होकर कुछ युवाओं ने यहां भी करीब 350 साल पुराने आंग्रे के बाड़े में देश का दूसरा सार्वजनिक गणेशोत्सव शुरू किया। 129 वर्षों से गणेशोत्सव की पूजा हो रही है। श्रीकाशी गणेशोत्सव कमेटी के बैनर तले मराठी समाज के पांच लोगों ने इसकी स्थापना की।
अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होने के लिए बाल गंगाधर तिलक ने मुंबई में सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत की थी। कुछ साल बाद ही उनकी प्रेरणा से काशी में भी यह शुरू हो गया। कमेटी के अध्यक्ष सुनील चितले ने बताया कि काशी महाराष्ट्र स्कूल बोर्ड ने 1898 में काशी में ब्रह्मा घाट स्थित सरदार आंग्रे के बाड़े में सार्वजनिक गणेशोत्सव की परंपरा की शुरुआत की। फिर राजाराम मेहेंदव्ठे, काशीनाथ रामचंद्र भागवत, राजाराम गणेश टोककर, गणेश चिमणा थत्थे और रामचंद्र नारायण गंगाजव्ठी ने मिलकर श्रीकाशी गणेशोत्सव कमेटी की स्थापना की। उन्होंने बताया कि आंग्रे का बाड़ा महाराजा शिवाजी के खासदार एक सरदार का था, जिसे कमेटी ने खरीद लिया। इसके बाद इसी में गणेशोत्सव शुरू हुआ। इस उत्सव में 1920 में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, 1923 में पं. मदनमोहन मालवीय, 1925 में अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, करपात्री जी महाराज, पं. शिव प्रसाद गुप्ता, शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती, बिहार के राज्यपाल रहे माधवहरि अणे, भैयाजी बनारसी आदि शामिल हो चुके हैं। इस उत्सव के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी काशी के बड़े कलाकार शामिल हो चुके हैं।
उत्साही युवाओं ने 118 वर्ष से दुर्गाघाट पर की पूजा शुरू
श्रीकाशी गणेशोत्सव कमेटी की स्थापना के बाद ही कुछ उत्साही युवाओं ने एक दशक बाद एक और संगठन खड़ा किया, जो आगे चलकर नूतन बालक गणेश उत्सव समिति के नाम से दुर्गाघाट पर सार्वजनिक उत्सव के रूप में शुरू हुआ। इस समिति से ही गणेशोत्सव के साथ शिक्षण संस्थाओं का भी संचालन शुरू हुआ। गणेशोत्सव, राधा कृष्ण नीलकंठेश्वर देवस्थान की पूजा के अलावा आज गणेश विद्या मंदिर इंटर कॉलेज और गणेश शिशु वाटिका संचालित होते हैं।
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काशी में बाजीराव पेशवा परिवार की 220 साल से गणेश पूजा
काशी में सबसे पुरानी बाजीराव पेशवा परिवार की गणेश पूजा है, जो सन 1807 से शुरू है। उनके प्रपौत्र अमृत राव पेशवा ने इसे शुरू किया था। रामघाट पर उन्होंने अमृत विनायक मूंगा गणेश मंदिर की स्थापना की। गणेश मंदिर एवं अन्नपूर्णा क्षेत्र एंडामेंट ट्रस्ट के प्रबंधक पं. किशन राम डोहकर ने बताया कि पेशवा परिवार के पुष्कर पेशवा पूजा में शामिल होते हैं। चतुर्भुज मूंगे के रंग की संगमरमर की प्रतिमा है, जो मूंगे के गणेश के नाम से प्रसिद्ध है। कमल की दो पत्तियों के ऊपर पालथी लगाए बाईं ओर सूंड और दाईं ओर का दांत है। ऐसे एकदंत भगवान श्री अमृत विनायक, जिनके सिर पर मुकुट विराजमान है। महाराष्ट्रीय रेशमी धोती एवं दुपट्टा धारण किए हुए हैं।
98 साल से अगस्तकुंडा पर पूजा
98 साल पहले शारदा भवन, अगस्त्यकुंडा में गणेशोत्सव शुरू हुआ। पाठक परिवार इस पूजा को करवाता है। यहां की प्रतिमा को गंगा में विसर्जन नहीं किया जाता है। बड़े पात्र में गंगाजल भरकर प्रतिमा विसर्जित की जाती है। पाठक परिवार के पं. यादवराव पाठक बताते हैं कि 1929 में संस्कृत के मूर्धन्य विद्वान पं. गौरीनाथ पाठक ने इस पूजा की शुरुआत की थी। भगवान गणेश का जन्म शास्त्रीय परंपरा के अनुसार मनाया जाता है। 21 तरह की वनस्पतियों से पूजा की जाती है।
96 वर्ष से जंगमबाड़ी, 64 वर्ष से जगतगंज में उत्सव
जंगमबाड़ी मठ का गणेश उत्सव सन 1930 में तत्कालीन 82वें जगद्गुरु के सानिध्य में शुरू हुआ। कान्यकुब्ज वैश्य हलवाई समिति द्वारा 1962 में गणेशोत्सव का प्रारंभ हुआ। जगतगंज, श्रीराम तारक आंध्र आश्रम मानसरोवर में गणेश नवरात्र की पूजा 1987 में, श्री गणेश उत्सव सेवा समिति की स्थापना 2001 में और श्रीराम मंदिर गणेशोत्सव मंडल बांसफाटक की स्थापना 2003 में हुई।
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अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होने के लिए बाल गंगाधर तिलक ने मुंबई में सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत की थी। कुछ साल बाद ही उनकी प्रेरणा से काशी में भी यह शुरू हो गया। कमेटी के अध्यक्ष सुनील चितले ने बताया कि काशी महाराष्ट्र स्कूल बोर्ड ने 1898 में काशी में ब्रह्मा घाट स्थित सरदार आंग्रे के बाड़े में सार्वजनिक गणेशोत्सव की परंपरा की शुरुआत की। फिर राजाराम मेहेंदव्ठे, काशीनाथ रामचंद्र भागवत, राजाराम गणेश टोककर, गणेश चिमणा थत्थे और रामचंद्र नारायण गंगाजव्ठी ने मिलकर श्रीकाशी गणेशोत्सव कमेटी की स्थापना की। उन्होंने बताया कि आंग्रे का बाड़ा महाराजा शिवाजी के खासदार एक सरदार का था, जिसे कमेटी ने खरीद लिया। इसके बाद इसी में गणेशोत्सव शुरू हुआ। इस उत्सव में 1920 में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, 1923 में पं. मदनमोहन मालवीय, 1925 में अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध, करपात्री जी महाराज, पं. शिव प्रसाद गुप्ता, शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती, बिहार के राज्यपाल रहे माधवहरि अणे, भैयाजी बनारसी आदि शामिल हो चुके हैं। इस उत्सव के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी काशी के बड़े कलाकार शामिल हो चुके हैं।
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उत्साही युवाओं ने 118 वर्ष से दुर्गाघाट पर की पूजा शुरू
श्रीकाशी गणेशोत्सव कमेटी की स्थापना के बाद ही कुछ उत्साही युवाओं ने एक दशक बाद एक और संगठन खड़ा किया, जो आगे चलकर नूतन बालक गणेश उत्सव समिति के नाम से दुर्गाघाट पर सार्वजनिक उत्सव के रूप में शुरू हुआ। इस समिति से ही गणेशोत्सव के साथ शिक्षण संस्थाओं का भी संचालन शुरू हुआ। गणेशोत्सव, राधा कृष्ण नीलकंठेश्वर देवस्थान की पूजा के अलावा आज गणेश विद्या मंदिर इंटर कॉलेज और गणेश शिशु वाटिका संचालित होते हैं।
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काशी में बाजीराव पेशवा परिवार की 220 साल से गणेश पूजा
काशी में सबसे पुरानी बाजीराव पेशवा परिवार की गणेश पूजा है, जो सन 1807 से शुरू है। उनके प्रपौत्र अमृत राव पेशवा ने इसे शुरू किया था। रामघाट पर उन्होंने अमृत विनायक मूंगा गणेश मंदिर की स्थापना की। गणेश मंदिर एवं अन्नपूर्णा क्षेत्र एंडामेंट ट्रस्ट के प्रबंधक पं. किशन राम डोहकर ने बताया कि पेशवा परिवार के पुष्कर पेशवा पूजा में शामिल होते हैं। चतुर्भुज मूंगे के रंग की संगमरमर की प्रतिमा है, जो मूंगे के गणेश के नाम से प्रसिद्ध है। कमल की दो पत्तियों के ऊपर पालथी लगाए बाईं ओर सूंड और दाईं ओर का दांत है। ऐसे एकदंत भगवान श्री अमृत विनायक, जिनके सिर पर मुकुट विराजमान है। महाराष्ट्रीय रेशमी धोती एवं दुपट्टा धारण किए हुए हैं।
98 साल से अगस्तकुंडा पर पूजा
98 साल पहले शारदा भवन, अगस्त्यकुंडा में गणेशोत्सव शुरू हुआ। पाठक परिवार इस पूजा को करवाता है। यहां की प्रतिमा को गंगा में विसर्जन नहीं किया जाता है। बड़े पात्र में गंगाजल भरकर प्रतिमा विसर्जित की जाती है। पाठक परिवार के पं. यादवराव पाठक बताते हैं कि 1929 में संस्कृत के मूर्धन्य विद्वान पं. गौरीनाथ पाठक ने इस पूजा की शुरुआत की थी। भगवान गणेश का जन्म शास्त्रीय परंपरा के अनुसार मनाया जाता है। 21 तरह की वनस्पतियों से पूजा की जाती है।
96 वर्ष से जंगमबाड़ी, 64 वर्ष से जगतगंज में उत्सव
जंगमबाड़ी मठ का गणेश उत्सव सन 1930 में तत्कालीन 82वें जगद्गुरु के सानिध्य में शुरू हुआ। कान्यकुब्ज वैश्य हलवाई समिति द्वारा 1962 में गणेशोत्सव का प्रारंभ हुआ। जगतगंज, श्रीराम तारक आंध्र आश्रम मानसरोवर में गणेश नवरात्र की पूजा 1987 में, श्री गणेश उत्सव सेवा समिति की स्थापना 2001 में और श्रीराम मंदिर गणेशोत्सव मंडल बांसफाटक की स्थापना 2003 में हुई।