{"_id":"140-96091","slug":"Varanasi-96091-140","type":"story","status":"publish","title_hn":"हम भी वहीं मौजूद थे, हमसे भी सब पूछा किए","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हम भी वहीं मौजूद थे, हमसे भी सब पूछा किए
Varanasi
Updated Sun, 05 May 2013 05:30 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
वाराणसी। चंदन वन उजड़ गया। आनंद वन कट गया। तब हम नहीं थे। इक्कीसवीं सदी में दीमकों से पूछकर ही जाना चंदन और आनंद वन की दास्तान। बारह सालों के सफर में कुछ भी घटित हुआ तो हम मौजूद रहे गवाह की तरह। कला, संस्कृति, संगीत के रस वर्षा के आनंद पलों के गवाह बने। चैती गुलाब का उत्सव गुलाबबाड़ी जब बेदखल हुआ, हम नहीं थे। उसको नया जीवन देने के यत्नों में हम शामिल रहे। बुढ़वा मंगल का पुनरुत्थान हुआ। मुंशी प्रेमचंद की 125 वीं सालगिरह के सरकारी के वादे देखे। उन्हें हकीकत बनाने के लिए बार-बार कुरेदते रहे। जैसे कभी भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की शाखा खोलने और गुलाबबाड़ी को उससे जोड़ने की खातिर अफसरों की मनुहार की।
अंतराष्ट्रीय भोजपुरी सम्मेलन बीएचयू में हुआ। उसकी कवरेज की नई भाषा रची गई। भोजपुरी की चाशनी और खड़ी बोली के इस रूप को सबने वैसे ही चाहा जैसे पं. छन्नूलाल मिश्र की गायकी में लोक-शास्त्र के मिटते भेद को चीन्हा देश ने। राजन-साजन मिश्र के बाद उनको पद्मभूषण मिला। काशी का अस्सी और रेहन पर रघू को सराहा गया। काशीनामा, कौन ठगवा नगरिया लूटल की भव्य नाट्य प्रस्तुतियां दिखीं। फिल्म बनी मुहल्ला अस्सी। ज्ञानेंद्र पति’ और काशीनाथ सिंह को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। सीताराम चतुर्वेदी, बच्चन सिंह, शुकदेव सिंह, राम जियावनदास बावला, श्रीकृष्ण तिवारी को खोना पड़ा। हमने इन सभी को शिद्दत से याद किया। अरुणाभ सौरभ, अनुज लुगुन, व्योमेश शुक्ल जैसों में हम उनका अक्स तलाशते रहे।
उस्ताद बिस्मिल्लाह खां, पं. रविशंकर जैसे भारतरत्न और पं. किशन महाराज जैसे पद्मविभूषण को खोने के बाद नए संगीत नक्षत्र के उदय की प्रतीक्षा में ध्रुपद मेला, संकट मोचन संगीत की गौरशाली परंपरा को श्रीमठ संगीत समारोह ने आगे बढ़ाया। लिटिल चैंप में यथार्थ रत्नम, क्लासिकल वायस आफ यूपी में देवांशु घोष, सुर संग्राम में आलोक पांडेय ने परचम लहराया। व्यास महोत्सव काशी के कैलेंडर में जुड़ा तो खुश हुए और व्यवधान पड़ा तो दिल भी दुखा भी। एबीसी कला दीर्घा बंद हुई तो कृति जैसी गैलरी खुली।
विज्ञापन
मुंबई, कोलकाता और दक्षिण भारतीय मायानगरियों को काशी का फोटोजेनिक चेहरा भाया तो भारतीय ही नहीं कनाडा, आस्ट्रेलिया, अमेरिका के टीवी चैनल भी पहुंच गए। काशी ने ही हालीवुड की एलेक्जेंडर द ग्रेट, जोधा अकबर जैसी फिल्मों के कास्ट्यूम डिजाइन हुए। ट्रेवेल, लाइफ स्टाइल के शो का प्रिय बनारस में बनी स्माइल पिंकी को आस्कर जीतने में सफल रही। मनोज तिवारी लोक गायक से नायक बन गए। फिल्म ससुरा बड़ा पइसावाला की ताकत हमने पहचानी, जिसने भोजपुरी सिनेमा का परिदृश्य बदल डाला। भोजपुरी में ही हरिराम द्विवेदी को साहित्य अकादमी का भाषा पुरस्कार मिला। हमने राधाकृष्ण, बालाजी मंदिर में मक्खन के कपड़े बनते देखे और दिखाए। एफएम रेडियो की धमक हमने सुनी और सबको सुनाई। हर उस जगह मौजूद रहा ‘अमर उजाला’ जहां चांदी पर रंग का मुलम्मा चढ़ाने (गुलाबी मीनाकारी), लकड़ी को काट कर खिलौना, रेशम-सोना पिरोकर पोशाक बनाने का हुनर
जब भी नया रूप लेकर सामने आया, नई जद्दोजहद में फंसा, अमर उजाला साथ ही रहा। जिंदगी की दास्तान, रचनाधर्मिता अदा और कला की लोकरुचि को पिरोकर पुरवाई का पन्ना हमीं ने तो रचा।
विज्ञापन
अंतराष्ट्रीय भोजपुरी सम्मेलन बीएचयू में हुआ। उसकी कवरेज की नई भाषा रची गई। भोजपुरी की चाशनी और खड़ी बोली के इस रूप को सबने वैसे ही चाहा जैसे पं. छन्नूलाल मिश्र की गायकी में लोक-शास्त्र के मिटते भेद को चीन्हा देश ने। राजन-साजन मिश्र के बाद उनको पद्मभूषण मिला। काशी का अस्सी और रेहन पर रघू को सराहा गया। काशीनामा, कौन ठगवा नगरिया लूटल की भव्य नाट्य प्रस्तुतियां दिखीं। फिल्म बनी मुहल्ला अस्सी। ज्ञानेंद्र पति’ और काशीनाथ सिंह को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। सीताराम चतुर्वेदी, बच्चन सिंह, शुकदेव सिंह, राम जियावनदास बावला, श्रीकृष्ण तिवारी को खोना पड़ा। हमने इन सभी को शिद्दत से याद किया। अरुणाभ सौरभ, अनुज लुगुन, व्योमेश शुक्ल जैसों में हम उनका अक्स तलाशते रहे।
विज्ञापन
उस्ताद बिस्मिल्लाह खां, पं. रविशंकर जैसे भारतरत्न और पं. किशन महाराज जैसे पद्मविभूषण को खोने के बाद नए संगीत नक्षत्र के उदय की प्रतीक्षा में ध्रुपद मेला, संकट मोचन संगीत की गौरशाली परंपरा को श्रीमठ संगीत समारोह ने आगे बढ़ाया। लिटिल चैंप में यथार्थ रत्नम, क्लासिकल वायस आफ यूपी में देवांशु घोष, सुर संग्राम में आलोक पांडेय ने परचम लहराया। व्यास महोत्सव काशी के कैलेंडर में जुड़ा तो खुश हुए और व्यवधान पड़ा तो दिल भी दुखा भी। एबीसी कला दीर्घा बंद हुई तो कृति जैसी गैलरी खुली।
विज्ञापन
मुंबई, कोलकाता और दक्षिण भारतीय मायानगरियों को काशी का फोटोजेनिक चेहरा भाया तो भारतीय ही नहीं कनाडा, आस्ट्रेलिया, अमेरिका के टीवी चैनल भी पहुंच गए। काशी ने ही हालीवुड की एलेक्जेंडर द ग्रेट, जोधा अकबर जैसी फिल्मों के कास्ट्यूम डिजाइन हुए। ट्रेवेल, लाइफ स्टाइल के शो का प्रिय बनारस में बनी स्माइल पिंकी को आस्कर जीतने में सफल रही। मनोज तिवारी लोक गायक से नायक बन गए। फिल्म ससुरा बड़ा पइसावाला की ताकत हमने पहचानी, जिसने भोजपुरी सिनेमा का परिदृश्य बदल डाला। भोजपुरी में ही हरिराम द्विवेदी को साहित्य अकादमी का भाषा पुरस्कार मिला। हमने राधाकृष्ण, बालाजी मंदिर में मक्खन के कपड़े बनते देखे और दिखाए। एफएम रेडियो की धमक हमने सुनी और सबको सुनाई। हर उस जगह मौजूद रहा ‘अमर उजाला’ जहां चांदी पर रंग का मुलम्मा चढ़ाने (गुलाबी मीनाकारी), लकड़ी को काट कर खिलौना, रेशम-सोना पिरोकर पोशाक बनाने का हुनर
जब भी नया रूप लेकर सामने आया, नई जद्दोजहद में फंसा, अमर उजाला साथ ही रहा। जिंदगी की दास्तान, रचनाधर्मिता अदा और कला की लोकरुचि को पिरोकर पुरवाई का पन्ना हमीं ने तो रचा।