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अंजनी के लालन जन्मे, चहुंदिशि बजी बधाई
Varanasi
Updated Fri, 26 Apr 2013 05:30 AM IST
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वाराणसी। जन्म लेते ही भगवान सूर्य को निगल जाने वाले रामभक्त हनुमान की जयंती पर गुरुवार को उत्सव के रंग में काशी रंगी रही। संकट मोचन में नौ दिनी उत्सव का जोरदार आगाज हो गया। इस बार शहर के अलावा पूर्वांचल भर से भक्तों का रेला उमड़ने से परिसर में तिल रखने तक की जगह नहीं बची। कहीं रामायण मंडलियां ढोल-झांझ, मंजीरे के साथ झूमती नजर आईं तो कहीं जय श्रीराम के गगनभेदी जयघोष पर मुग्ध भक्तों का समूह। अलग-अलग इलाके से निकाली गईं झांकियों, शोभायात्राओं का तांता लगने से दरबार में मेले जैसा मंजर नजर आया।
सुबह पुजारी ने गर्भगृह में संकट मोचन महाराज का सिंदूर लेप किया। इसके बाद वर्ष में सिर्फ एक बार जयंती पर सजने वाली बैठकी की झांकी का शृंगार किया गया। रुद्राभिषेक आचार्य स्वर्ण प्रताप चतुर्वेदी ने कराया। रामार्चन पूजा के बाद राम दरबार में सुग्रीव, अंगद तक पूजे गए। फिर वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड का पाठ हुआ। दिन के करीब 11 बजे तक मंदिर परिसर में तिल रखना मुश्किल हो गया था। दर्शन के लिए महिलाओं-पुरुषों की अलग-अलग कतार लगी थी। लाल ध्वजा-पताकाओं के साथ जय श्रीराम का जयघोष करते भक्त संकट मोचन के दरबार की ओर बढ़ रहे थे। महिलाओं की टोलियां जगह-जगह बधाई के साथ ही मंगलाचार और सोहर गा रही थीं। शाम को रामकृष्ण मिशन के संन्यासियों की ओर से भजन-संकीर्तन शुरू हुआ। इससे पहले, महंत प्रोफेसर विश्वंभरनाथ मिश्र ने भक्तों को प्रसाद वितरित किया।
कोट
संकट मोचन जी की प्रतिमा खड़ी मुद्रा में है। मान्यता है कि भगवान राम के कार्यों के चलते वह वर्ष भर खड़े रहते हैं। सिर्फ एक बार जयंती के दिन वह विश्राम करते हैं। इसलिए विश्राम की मुद्रा में बैठकी की झांकी सजाई गई। बैठकी मुद्रा में संकट मोचन का दर्शन वर्ष में सिर्फ एक बार ही होता है। - प्रोफेसर विश्वंभरनाथ मिश्र, महंत (संकट मोचन मंदिर)
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इनसेट
चंद्रग्रहण के चलते मंदिरों के कपाट बंद
वाराणसी। चंद्रग्रहण के चलते गुरुवार की शाम को ही सूतक लग गया। इस वजह से संकट मोचन समेत अन्य मंदिरों के कपाट शाम 4.30 बजे ही बंदकर दिए गए। संकट मोचन में कपाट बंद होने के बाद हनुमान जयंती पर चलते वाले कीर्तन और रामायण मंडलियों के कार्यक्रम निर्वाध गति से चले। रात 01.18 बजे चंद्रग्रहण लगेगा और 01.49 बजे मोक्ष हो जाएगा।
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सुबह पुजारी ने गर्भगृह में संकट मोचन महाराज का सिंदूर लेप किया। इसके बाद वर्ष में सिर्फ एक बार जयंती पर सजने वाली बैठकी की झांकी का शृंगार किया गया। रुद्राभिषेक आचार्य स्वर्ण प्रताप चतुर्वेदी ने कराया। रामार्चन पूजा के बाद राम दरबार में सुग्रीव, अंगद तक पूजे गए। फिर वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड का पाठ हुआ। दिन के करीब 11 बजे तक मंदिर परिसर में तिल रखना मुश्किल हो गया था। दर्शन के लिए महिलाओं-पुरुषों की अलग-अलग कतार लगी थी। लाल ध्वजा-पताकाओं के साथ जय श्रीराम का जयघोष करते भक्त संकट मोचन के दरबार की ओर बढ़ रहे थे। महिलाओं की टोलियां जगह-जगह बधाई के साथ ही मंगलाचार और सोहर गा रही थीं। शाम को रामकृष्ण मिशन के संन्यासियों की ओर से भजन-संकीर्तन शुरू हुआ। इससे पहले, महंत प्रोफेसर विश्वंभरनाथ मिश्र ने भक्तों को प्रसाद वितरित किया।
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कोट
संकट मोचन जी की प्रतिमा खड़ी मुद्रा में है। मान्यता है कि भगवान राम के कार्यों के चलते वह वर्ष भर खड़े रहते हैं। सिर्फ एक बार जयंती के दिन वह विश्राम करते हैं। इसलिए विश्राम की मुद्रा में बैठकी की झांकी सजाई गई। बैठकी मुद्रा में संकट मोचन का दर्शन वर्ष में सिर्फ एक बार ही होता है। - प्रोफेसर विश्वंभरनाथ मिश्र, महंत (संकट मोचन मंदिर)
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चंद्रग्रहण के चलते मंदिरों के कपाट बंद
वाराणसी। चंद्रग्रहण के चलते गुरुवार की शाम को ही सूतक लग गया। इस वजह से संकट मोचन समेत अन्य मंदिरों के कपाट शाम 4.30 बजे ही बंदकर दिए गए। संकट मोचन में कपाट बंद होने के बाद हनुमान जयंती पर चलते वाले कीर्तन और रामायण मंडलियों के कार्यक्रम निर्वाध गति से चले। रात 01.18 बजे चंद्रग्रहण लगेगा और 01.49 बजे मोक्ष हो जाएगा।