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भारतरत्न रविशंकर का अस्थि कलश काशी पहुंचा
Varanasi
Updated Tue, 12 Mar 2013 05:30 AM IST
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वाराणसी। सितार को विश्व जगत में नई पहचान देने वाले भारतरत्न पं. रविशंकर की अस्थियां मंगलवार को गंगा में विसर्जित होंगी। पत्नी सुकन्या शंकर और पुत्री अनुष्का शंकर अपने गिनती के रिश्तेदारों और करीबियों के साथ सोमवार को अस्थि कलश लेकर काशी पहुंचीं।
काशी में सितार सम्राट की अस्थियों के विसर्जन की जानकारी बनारस घराने के कलाकारों को भी नहीं दी गई है। शिवाला घाट स्थित सूर्योदय हवेली में अस्थि कलश के साथ शाम करीब चार बजे पहुंचीं सुकन्या अपनी पुत्री के साथ पीछे के रास्ते से सीधे होटल में दाखिल हो गईं। भारतरत्न रविशंकर का अस्थि कलश लेकर बाबतपुर एयरपोर्ट से अस्सी घाट पहुंचे परिजनों की अगवानी पुरातत्व अधीक्षण अजय श्रीवास्तव के अलावा क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. सुभाष यादव और एसीएम फर्स्ट राधेश्याम ने की। अफसरों ने मोटरबोट से उन्हें शिवाला घाट स्थित होटल तक पहुंचाया। वहां पहले से मौजूद छायाकारों और खबरनवीसों की काफी जद्दोजहद के बाद पुरातत्व अधीक्षण अजय ने बताया कि अब जो होगा मंगलवार को ही होगा। परिजन शोक में व्यथित हैं, इसलिए वह कुछ बोलने से परहेज कर रहे हैं। पद्मभूषण पं. छन्नूलाल मिश्र तक को पं. रविशंकर का अस्थि कलश लाने की जानकारी नहीं दी गई। बीते साल पं. रविशकंर जब दिल्ली आए थे तो उन्होंने पं. छन्नूलाल को बुलाकर उनसे बनारसी ठुमरी सुनी थी।
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काशी में सितार सम्राट की अस्थियों के विसर्जन की जानकारी बनारस घराने के कलाकारों को भी नहीं दी गई है। शिवाला घाट स्थित सूर्योदय हवेली में अस्थि कलश के साथ शाम करीब चार बजे पहुंचीं सुकन्या अपनी पुत्री के साथ पीछे के रास्ते से सीधे होटल में दाखिल हो गईं। भारतरत्न रविशंकर का अस्थि कलश लेकर बाबतपुर एयरपोर्ट से अस्सी घाट पहुंचे परिजनों की अगवानी पुरातत्व अधीक्षण अजय श्रीवास्तव के अलावा क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. सुभाष यादव और एसीएम फर्स्ट राधेश्याम ने की। अफसरों ने मोटरबोट से उन्हें शिवाला घाट स्थित होटल तक पहुंचाया। वहां पहले से मौजूद छायाकारों और खबरनवीसों की काफी जद्दोजहद के बाद पुरातत्व अधीक्षण अजय ने बताया कि अब जो होगा मंगलवार को ही होगा। परिजन शोक में व्यथित हैं, इसलिए वह कुछ बोलने से परहेज कर रहे हैं। पद्मभूषण पं. छन्नूलाल मिश्र तक को पं. रविशंकर का अस्थि कलश लाने की जानकारी नहीं दी गई। बीते साल पं. रविशकंर जब दिल्ली आए थे तो उन्होंने पं. छन्नूलाल को बुलाकर उनसे बनारसी ठुमरी सुनी थी।
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