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चक्रपुष्पकरणी में हजारों श्रद्धालुओं ने लगाई मोक्ष की डुबकी
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वाराणसी। मोक्ष की कामना से मणिकर्णिका घाट स्थित चक्रपुष्पकरणी कुंड में बुधवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने मध्याह्न स्नान किया। विशेष मुहूर्त में स्नान करने के बाद श्रद्धालुओं ने मां गंगा में भी डुबकी लगाई और भगवान शंकर-पार्वती से इस भवसागर से पार होने की कामना की।
स्नान के निमित्त बुधवार को सुबह से ही श्रद्धालुओं के आने का क्रम शुरू हो गया। दोपहर 1 बजकर 30 मिनट पर देवी मणिकर्णिका की पूजा की गई। आरती उतारने के बाद 1 बजकर 40 मिनट पर हर महादेव के जयकारे लगाते हुए एक साथ सैकड़ों श्रद्धालु, पंडा-पुजारी चक्रपुष्पकरणी कुंड में कूद पड़े और पूरे मनोयोग से स्नान किया। इसके बाद विधान के अनुरूप श्रद्धालुओं ने गंगा में भी स्नान किया।
बतादें कि बैशाख में अक्षय तृतीया के दिन से शुरू होने वाले इस महोत्सव में पहले दिन कुंड के बीच में देवी मणिकर्णिका की प्रतिमा स्थापित की जाती है। विधि-विधान से पूजन-अर्चन कर उनका भव्य शृंगार किया जाता है। अगले दिन मध्याह्न में उनकी आरती उतारकर भोग लगाया जाता है। इसके बाद श्रद्धालु चक्रपुष्पकरणी कुंड में स्नान करते हैं।
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गंगा के प्रवाह से पहले का है कुंड
तीर्थ पुजारी रामशंकर द्विवेदी उर्फ भैयो महाराज ने बताया कि यही एक ऐसा तीर्थ है, जहां मध्याह्न में स्नान के बाद मोक्ष की कामना की जाती है। उन्होंने बताया कि यह कुंड गंगा के प्रवाह से पहले का है, जिसे भगवान विष्णु ने अपने चक्र से बनाया है। यहां स्नान के दौरान माता पार्वती के कान की मणि गिर गई थी, जिसके चलते घाट का नाम मणिकर्णिका पड़ गया। मान्यता यह भी है कि अक्षय तृतीया के दूसरे दिन यहां पर भगवान शंकर और भगवान विष्णु भी स्नान करने पहुंचते हैं। इस कुंड में स्नान के बाद गंगा में भी डुबकी लगाने का विधान है, तब इसका पूरा पुण्य मिलता है
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स्नान के निमित्त बुधवार को सुबह से ही श्रद्धालुओं के आने का क्रम शुरू हो गया। दोपहर 1 बजकर 30 मिनट पर देवी मणिकर्णिका की पूजा की गई। आरती उतारने के बाद 1 बजकर 40 मिनट पर हर महादेव के जयकारे लगाते हुए एक साथ सैकड़ों श्रद्धालु, पंडा-पुजारी चक्रपुष्पकरणी कुंड में कूद पड़े और पूरे मनोयोग से स्नान किया। इसके बाद विधान के अनुरूप श्रद्धालुओं ने गंगा में भी स्नान किया।
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बतादें कि बैशाख में अक्षय तृतीया के दिन से शुरू होने वाले इस महोत्सव में पहले दिन कुंड के बीच में देवी मणिकर्णिका की प्रतिमा स्थापित की जाती है। विधि-विधान से पूजन-अर्चन कर उनका भव्य शृंगार किया जाता है। अगले दिन मध्याह्न में उनकी आरती उतारकर भोग लगाया जाता है। इसके बाद श्रद्धालु चक्रपुष्पकरणी कुंड में स्नान करते हैं।
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गंगा के प्रवाह से पहले का है कुंड
तीर्थ पुजारी रामशंकर द्विवेदी उर्फ भैयो महाराज ने बताया कि यही एक ऐसा तीर्थ है, जहां मध्याह्न में स्नान के बाद मोक्ष की कामना की जाती है। उन्होंने बताया कि यह कुंड गंगा के प्रवाह से पहले का है, जिसे भगवान विष्णु ने अपने चक्र से बनाया है। यहां स्नान के दौरान माता पार्वती के कान की मणि गिर गई थी, जिसके चलते घाट का नाम मणिकर्णिका पड़ गया। मान्यता यह भी है कि अक्षय तृतीया के दूसरे दिन यहां पर भगवान शंकर और भगवान विष्णु भी स्नान करने पहुंचते हैं। इस कुंड में स्नान के बाद गंगा में भी डुबकी लगाने का विधान है, तब इसका पूरा पुण्य मिलता है