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लोकगीतों में निहित है स्त्री का जीवन चरित्र
Updated Sun, 24 Dec 2017 02:37 AM IST
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वाराणसी। प्रसिद्ध लोक गायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने कहा कि स्त्री जितनी सशक्त पहले थी, उतनी आज नहीं है। स्त्री सशक्तिकरण की अवधारणा हमें अपनी मां और दादी के जीवन चरित्र से समझनी होगी। उनके त्याग और प्रतीक्षा में भारत का समूचा आदर्श समाया हुआ है। भारत को समझने के लिए हमें स्त्री को समझना होगा और स्त्री को समझने के लिए लोक को समझना होगा जो लोकगीतों में निहित है।
मालिनी अवस्थी शनिवार को बीएचयू के भारत अध्ययन केंद्र में आयोजित ‘लोकगीतों में स्त्री सशक्तिकरण के स्वर’ विषय पर व्याख्यान दे रही थीं। उन्होंने कहा कि भारतीय नारी की सशक्त उदाहरण के रूप में सीता हमारे सामने वाल्मीकि की सीता, तुलसी की सीता जैसे अन्यान्य लेखकों की रचना में उभरीं लेकिन उनका सर्वाधिक सशक्त स्वरूप लोकगीतों में ही उभरा। अनपढ़ महिलाओं ने सीता के सशक्त चरित्र को अपने अनगढ़ गीतों में सशक्त चेतना के साथ गढ़ा है। उन्होंने कहा कि हमें पुराणों के साथ लोकगीतों को भी इतिहास मानना चाहिए।
अपने व्याख्यान की शुरुआत उन्होंने स्वरचित सोहर ‘सुनयना के हर्ष अपार कि सिया का जनम हुआ...’ गाकर की। इस दौरान उन्होंने रानी पद्मावती के जौहर पर भी लोकगीत प्रस्तुत किया। अध्यक्षता करते हुए लोक गीतकार पं. हरिराम द्विवेदी ने कहा कि हर अंचल की तस्वीर वहां के लोकगीतों में समाई हुई है। स्वागत प्रो. राकेश उपाध्याय ने किया। संचालन डॉ. अमित कुमार पांडेय और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. सदाशिव द्विवेदी ने किया। इस दौरान प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी, प्रो. श्रीप्रकाश पांडेय, प्रो. राजा वशिष्ठ त्रिपाठी, प्रो. सदानंद शाही, प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल, प्रो. मंजीत चतुर्वेदी आदि मौजूद रहे।
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मालिनी अवस्थी शनिवार को बीएचयू के भारत अध्ययन केंद्र में आयोजित ‘लोकगीतों में स्त्री सशक्तिकरण के स्वर’ विषय पर व्याख्यान दे रही थीं। उन्होंने कहा कि भारतीय नारी की सशक्त उदाहरण के रूप में सीता हमारे सामने वाल्मीकि की सीता, तुलसी की सीता जैसे अन्यान्य लेखकों की रचना में उभरीं लेकिन उनका सर्वाधिक सशक्त स्वरूप लोकगीतों में ही उभरा। अनपढ़ महिलाओं ने सीता के सशक्त चरित्र को अपने अनगढ़ गीतों में सशक्त चेतना के साथ गढ़ा है। उन्होंने कहा कि हमें पुराणों के साथ लोकगीतों को भी इतिहास मानना चाहिए।
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अपने व्याख्यान की शुरुआत उन्होंने स्वरचित सोहर ‘सुनयना के हर्ष अपार कि सिया का जनम हुआ...’ गाकर की। इस दौरान उन्होंने रानी पद्मावती के जौहर पर भी लोकगीत प्रस्तुत किया। अध्यक्षता करते हुए लोक गीतकार पं. हरिराम द्विवेदी ने कहा कि हर अंचल की तस्वीर वहां के लोकगीतों में समाई हुई है। स्वागत प्रो. राकेश उपाध्याय ने किया। संचालन डॉ. अमित कुमार पांडेय और धन्यवाद ज्ञापन प्रो. सदाशिव द्विवेदी ने किया। इस दौरान प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी, प्रो. श्रीप्रकाश पांडेय, प्रो. राजा वशिष्ठ त्रिपाठी, प्रो. सदानंद शाही, प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल, प्रो. मंजीत चतुर्वेदी आदि मौजूद रहे।
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