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‘भारत रत्न भूपेन द’ काशी गौरवान्वित है
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आशुतोष द्विवेदी
वाराणसी। भले ही भूपेन दा का संगीत ब्रह्मपुत्र की लहरों पर तरंगित होकर पूरी दुनिया में पहुंचा हो। परन्तु, काशी के गंगा तटों ने बीएचयू के एक छात्र भूपेन को वर्षों तक सुनकर आकार दिया। काशी सबको अपना मानती है, उसके विद्यार्थी में बना कला का रस यहीं और गाढ़ा हुआ, इसलिए बनारस उनके ‘भारत रत्न’ होने पर गौरवान्वित है।
कहते हैं कि बनारस के कबीर चौरा में आवाज दो तो कोई बड़ी बात नहीं कि कई खिड़कियां खुल जाएं। दिवंगत भूपेन हजारिका को मिला भारत रत्न काशी अपने हिस्से में ही मानता है। काशी वासी मानते हैं यह सवोच्च सम्मान उन्हें उनके 2011 से पहले सशरीर रहने तक ही मिल जाना चाहिए। वैसे तो1944 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक किया और 1946 में परास्नातक....मगर कैंपस से इतर उनकी दुनिया बल खाती गलियां थीं या वलयाकार घाट। नाव पर लहरों की सवारी उन्हें ब्रह्मपुत्र के अपनत्व से जोड़ देती थी।
सुप्रसिद्ध संगीताज्ञ पद्यश्री राजेश्वर आचार्य बताते हैं कि उनके संगीत और व्यक्तित्व में काशी का एक कोना हमेशा सुरक्षित रहा। बीएचयू में शिक्षा के दौरान वो अतिरिक्त गतिविधियों, संगीत, कला, कविता और मस्ती के लिए अधिक प्रसिद्ध थे। संगीत और साहित्य प्रेमी होने कारण उस समय के गायकों-वादकों में ही उठना-बैठना था। क्लास के बाद अपनी साइकिल पर वो गुनगुनाते हुए निकल पड़ते तो शाम को ही लौटते। अधिक समय उनका शहर के कलाकारों के बीच घाटों पर बीतता। हर समय गायन के प्रति आतुर और कविता से भरे रहते। उन्होंने थोड़े-थोड़े सयम के लिए कई कलाकारों से गायन-वादन भी सीखा। काशी का हक इसी से समझा जा सकता है तो कि जो युवक यहां राजनीति का शास्त्र पढ़ने आया था उसके जीवन के महत्वपूर्ण पांच सालों में काशी ने उसे कला का रत्न जड़ित पात्र बना दिया।
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वाराणसी। भले ही भूपेन दा का संगीत ब्रह्मपुत्र की लहरों पर तरंगित होकर पूरी दुनिया में पहुंचा हो। परन्तु, काशी के गंगा तटों ने बीएचयू के एक छात्र भूपेन को वर्षों तक सुनकर आकार दिया। काशी सबको अपना मानती है, उसके विद्यार्थी में बना कला का रस यहीं और गाढ़ा हुआ, इसलिए बनारस उनके ‘भारत रत्न’ होने पर गौरवान्वित है।
कहते हैं कि बनारस के कबीर चौरा में आवाज दो तो कोई बड़ी बात नहीं कि कई खिड़कियां खुल जाएं। दिवंगत भूपेन हजारिका को मिला भारत रत्न काशी अपने हिस्से में ही मानता है। काशी वासी मानते हैं यह सवोच्च सम्मान उन्हें उनके 2011 से पहले सशरीर रहने तक ही मिल जाना चाहिए। वैसे तो1944 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक किया और 1946 में परास्नातक....मगर कैंपस से इतर उनकी दुनिया बल खाती गलियां थीं या वलयाकार घाट। नाव पर लहरों की सवारी उन्हें ब्रह्मपुत्र के अपनत्व से जोड़ देती थी।
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सुप्रसिद्ध संगीताज्ञ पद्यश्री राजेश्वर आचार्य बताते हैं कि उनके संगीत और व्यक्तित्व में काशी का एक कोना हमेशा सुरक्षित रहा। बीएचयू में शिक्षा के दौरान वो अतिरिक्त गतिविधियों, संगीत, कला, कविता और मस्ती के लिए अधिक प्रसिद्ध थे। संगीत और साहित्य प्रेमी होने कारण उस समय के गायकों-वादकों में ही उठना-बैठना था। क्लास के बाद अपनी साइकिल पर वो गुनगुनाते हुए निकल पड़ते तो शाम को ही लौटते। अधिक समय उनका शहर के कलाकारों के बीच घाटों पर बीतता। हर समय गायन के प्रति आतुर और कविता से भरे रहते। उन्होंने थोड़े-थोड़े सयम के लिए कई कलाकारों से गायन-वादन भी सीखा। काशी का हक इसी से समझा जा सकता है तो कि जो युवक यहां राजनीति का शास्त्र पढ़ने आया था उसके जीवन के महत्वपूर्ण पांच सालों में काशी ने उसे कला का रत्न जड़ित पात्र बना दिया।
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