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शान के साथ निकला काशीराज प्रतिनिधि का विजय जुलूस
Updated Fri, 19 Oct 2018 02:16 AM IST
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रामनगर । श्री राम की रावण पर विजय के उपलक्ष्य में काशी राज के प्रतिनिधि अनन्त नारायण सिंह का विजय जुलूस गुरुवार की शाम पौने पांच शाही अंदाज में निकला। जुलूस में सबसे आगे बनारस स्टेट का झंडा लेकर किले के मुसाहिब मुन्ना सिंह चल रहे थे। उनके पीछे डंका वादक घुड़सवार और घुड़सवार पुलिस का दल चल रहा था। इसके बाद अनंत नारायण सिंह हाथी पर सवार होकर निकले। किले के बाहर खड़े लोगों ने हर हर महादेव के उद्घोष के साथ उनका अभिवादन किया।
बटाऊबीर पहुंचकर उन्होंने शमी वृक्ष का पूजन किया और शांति के प्रतीक कबूतर छोड़े । इसके बाद काफिला लंका रणभूमि पहुंचा। यहां रणभूमि की परिक्रमा की। दरबार हाल में किले के मुसाहिबों ने उन्हें नजर पेश की। इसके पूर्व काशी राज के प्रतिनिधि अनंत नारायण सिंह रामनगर किले के झंडा गेट पर अपराह्न तीन बजे शस्त्र पूजन पर बैठे। बाहर निकलने पर पीएसी के जवानों ने सलामी दी। पूजा के बाद अनंत नारायण सिंह ने किले में स्थित मां काली के अलावा कुल देवी देवताओं के दर्शन पूजन किए।
इनसेट---
अब नही दी जाती सात तोपों की सलामी
रामनगर । पहले जब काशीराज शस्त्र पूजा पर बैठते थे तो उन्हें सात तोपों की सलामी दी जाती थी। लेकिन सन 2002 में ये परंपरा बंद कर दी गई। अब खंदक मैदान में तोप ले जाये जाते हैं लेकिन केवल तोप की पूजा ही होती है। जानकार बताते हैं कि बनारस स्टेट का जब केंद्र में विलय हुआ था तो जो मर्जर डीड बनी थी उसमें पूर्व काशीराज को ही सलामी की बात दर्ज की गई थी। इसलिए उनके निधन के बाद यह परंपरा बंद हो गई।
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बटाऊबीर पहुंचकर उन्होंने शमी वृक्ष का पूजन किया और शांति के प्रतीक कबूतर छोड़े । इसके बाद काफिला लंका रणभूमि पहुंचा। यहां रणभूमि की परिक्रमा की। दरबार हाल में किले के मुसाहिबों ने उन्हें नजर पेश की। इसके पूर्व काशी राज के प्रतिनिधि अनंत नारायण सिंह रामनगर किले के झंडा गेट पर अपराह्न तीन बजे शस्त्र पूजन पर बैठे। बाहर निकलने पर पीएसी के जवानों ने सलामी दी। पूजा के बाद अनंत नारायण सिंह ने किले में स्थित मां काली के अलावा कुल देवी देवताओं के दर्शन पूजन किए।
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अब नही दी जाती सात तोपों की सलामी
रामनगर । पहले जब काशीराज शस्त्र पूजा पर बैठते थे तो उन्हें सात तोपों की सलामी दी जाती थी। लेकिन सन 2002 में ये परंपरा बंद कर दी गई। अब खंदक मैदान में तोप ले जाये जाते हैं लेकिन केवल तोप की पूजा ही होती है। जानकार बताते हैं कि बनारस स्टेट का जब केंद्र में विलय हुआ था तो जो मर्जर डीड बनी थी उसमें पूर्व काशीराज को ही सलामी की बात दर्ज की गई थी। इसलिए उनके निधन के बाद यह परंपरा बंद हो गई।
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