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25 दिन-25 कहानियां: यह बनारस ही है जहां गंगा की धारा उलट गई और आम लंगड़ा हो गया, दिलचस्प जानकारी

Sun, 17 May 2026 10:36 AM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Sun, 17 May 2026 10:36 AM IST
सार

Varanasi News: जाने माने कार्टूनिस्ट और काशी पत्रकार संघ के पूर्व अध्यक्ष डॉ. अत्रि भारद्वाज ने बताया कि काशी के मनोरंजन कांतिलाल के कार्टून में अखंड भारतीय राजनीतिक खड़खड़ाहट का पोस्टमार्टम दिखता था। 25 वर्षों में अब संचार साधन और कार्टून एक-दूसरे से बिछड़ चुके हैं। बनारस ही है, जहां गंगा की धारा उलट गई और आम लंगड़ा हो गया। 

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25 Days 25 Stories indeed Banaras place where flow of Ganges reversed mango became Langda
काशी से धर्म का बोध होता है। - फोटो : संवाद

विस्तार

काशी से धर्म का बोध होता है, बनारस से यहां की मौज-मस्ती का और वाराणसी कागजी दुनिया की बात करता है। यह बनारस ही है, जहां गंगा की धारा उलट गई और आम लंगड़ा हो गया। बनारस की गप्पों में जो रस है, वह अकबर और बीरबल के किस्सों में भी नहीं। 

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महाज्ञानी भी जब तक काशी में अपनी मेधा की परीक्षा में क्वालिफाई नहीं होता, तब तक उसे मान्यता नहीं मिलती। इस ग्लोबल शहर में हर देश, मजहब और कौम की आवाजें सुनाई देती हैं। हर सौ-पचास कदम पर डॉ. शिवप्रसाद सिंह की एक ‘गली आगे मुड़ती है।’ काशी में जितने घाट और मंदिर हैं, उतने ही ख्यात साहित्यकारों के मोहल्ले, घर और सगे-संबंधी हैं।
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बनारसी माटी में गौतम का राग-विराग और शंकर का वेदांत निनाद भी सुनने को मिलता है। एक तरफ ध्रुपद, धमार और ख्याल का अलौकिक आलाप है तो दूसरी ओर सितार, शहनाई, पखावज और सारंगी का अद्वितीय स्वर-संतुलन, युगलबंदी और स्वर-साधना। यहां हर किसी में कबीर का अलमस्त फक्कड़पन और तुलसी का रामधुन है।

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काशी का दृश्य-श्रव्य माध्यम सिनेमा से भी खूब अठखेलियां करता रहा। फिल्मों के पितामह दादासाहब फाल्के खुद काशी में रहे। सत्यजीत रे ने काशी में ‘जय बाबा फेलूनाथ’ की शूटिंग फाल्के पुरस्कार पाने वाले सौमित्र चटर्जी के साथ की थी। तब के बनारस को जीकर सत्यजीत रे ने बनारस की तुलना वेनिस से की थी, जिसका वर्षों तक बनारसी अंदाज में अड़ियों पर अभिवादन चलता रहा। चरित्र अभिनेता कन्हैयालाल का तो गमछा भी अभिनय करता था। यहीं के त्रिलोक जेटली ने प्रेमचंद के ‘गोदान’ पर फिल्म बनाई थी, जिससे गीतकार समीर के पिता और प्रख्यात लेखक अंजान का फिल्मी करियर शुरू हुआ।

अहिंदी भाषी संपादकाचार्य पंडित बाबूराव विष्णु पराड़कर, लक्ष्मीनारायण गर्दे और रामकृष्ण रघुनाथ खाडिलकर के पत्रकारिता के दौर में खबरों की हैंड कंपोजिंग होती थी। फॉर्मा और फोटो के लिए ब्लॉक बनते थे। वर्ष 1972-73 में बतौर कार्टूनिस्ट मैं भी पत्रकारिता में दाखिल हो गया। तब मनोरंजन कांतिलाल के कार्टून में अखंड भारतीय राजनीतिक खड़खड़ाहट का पोस्टमार्टम दिखता था। कांतिलाल के बाद उनके शिष्य जगत शर्मा ने उनका खालीपन भरा। अब विनय कुल बनारसी अंदाज में रह-रहकर कार्टून उकेर देते हैं। मगर महसूस होता है कि संचार साधन और कार्टून एक-दूसरे से बिछड़ चुके हैं।

कुछ भी बिछड़ा है क्या? हां, बीते 25 वर्षों में पत्रकारिता और साहित्य के बीच शताब्दियों का संबंध। कुछ दशक पहले तक सभी पत्रकार साहित्यकार भी होते थे। खबरों की संवेदनाएं कहानियों जैसी होती थीं। वह पराड़कर युगीन मान्यताओं वाली रिपोर्टिंग बहुत याद आती है, जिसकी अंतिम कड़ी दीनानाथ गुप्त थे। मगर सच तो यह भी है कि जीवन में जब सब कुछ बदलता ही नहीं, तो वह याद ही क्यों आता। इसे रूपांतरण की तरह मानना चाहिए।

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