25 दिन 25 कहानियां: पूर्वांचल का रक्तकाल... एक मरता था, 10 नए शूटर पैदा हो जाते
रिटायर्ड आईपीएस संतोष कुमार सिंह ने कहा कि 1990 के पहले से ही वाराणसी में गैंगवार की आग सुलगने लगी थी। पश्चिमी यूपी में माफिया प्रॉपर्टी और जमीनों के लिए लड़ते थे, लेकिन पूर्वांचल में खेल अलग था। यहां लड़ाई होती थी रंगदारी की, बाजारों पर कब्जे की। दहशत की।
विस्तार
जहां घाटों पर आरती होती थी, वहीं दूसरी तरफ गलियों में बारूद की गंध भी तैरती थी। यह वह दौर था जब बनारस की रातें सिर्फ मंदिरों की घंटियों से नहीं, बल्कि गोलियों की तड़तड़ाहट से कांपती थीं। पश्चिमी यूपी में माफिया प्रॉपर्टी और जमीनों के लिए लड़ते थे, लेकिन पूर्वांचल में खेल अलग था। यहां लड़ाई होती थी रंगदारी की, बाजारों पर कब्जे की और दहशत की...।
1990 के पहले से ही वाराणसी में गैंगवार की आग सुलगने लगी थी। पश्चिमी यूपी में माफिया प्रॉपर्टी और जमीनों के लिए लड़ते थे, लेकिन पूर्वांचल में खेल अलग था। यहां लड़ाई होती थी रंगदारी की, बाजारों पर कब्जे की। दहशत की। लेकिन 90 के दशक में पूर्वांचल के अपराध जगत की धुरी बना एक नाम, मुख्तार अंसारी...। यहीं से कई बड़े शूटर, मुन्ना बजरंगी, कृपा चौधरी और आगे चलकर अन्नू त्रिपाठी जैसे नाम निकले।
मुन्ना बजरंगी सिर्फ शूटर नहीं था, वह शूटर भी तैयार करता था। उसके गिरोह में शामिल हुए अन्नू त्रिपाठी और बबलू यादव जैसे लड़के। शुरू में ये लड़के मामूली जरूरतों के लिए अपराध करते थे। अच्छे कपड़े, जूते, जेब में रुपये और इलाके में रौब। बनारस के व्यापारी उस समय सबसे ज्यादा खौफ में जीते थे।
विशेश्वरगंज की मंडियां हों या दवा बाजार, हर जगह रंगदारी की परछाईं थी। जो व्यापारी पैसा देता, वह बच जाता। जो इन्कार करता, उसका नाम सूची में चढ़ जाता। इसी दौर में विशेश्वरगंज व्यापार मंडल के विधि मंत्री अरुण सिंह ने खुलकर एलान किया कि वह रंगदारी नहीं देंगे और व्यापारियों से भी कहा कि किसी गैंग के आगे मत झुको। यह चुनौती सीधे माफिया तंत्र को थी। महामृत्युंजय मंदिर के पास दिनदहाड़े मुन्ना बजरंगी के आदेश पर अन्नू त्रिपाठी ने अरुण सिंह की हत्या कर दी।
उस वक्त मुन्ना बजरंगी यूपी छोड़कर हरियाणा में एक बड़े नेता के फार्म हाउस पर शरण लिए हुए था। लेकिन उसका नेटवर्क पूर्वांचल में जिंदा था। उधर, अन्नू त्रिपाठी खुद बड़ा खिलाड़ी बन चुका था। उसने अपने स्तर पर रंगदारी वसूलनी शुरू कर दी। कहा जाता है कि वह सालाना करीब दो करोड़ रुपये तक उगाही करने लगा था।
चेतगंज के नटराज सिनेमा हॉल के मालिक की हत्या भी इसी रंगदारी नेटवर्क का हिस्सा मानी गई। जो झुकता नहीं था, उसे खत्म कर दिया जाता था। पुलिस लगातार एनकाउंटर करती थी। हर महीने किसी न किसी शूटर की लाश गिरती थी। लेकिन एक मरता तो दस नए तैयार हो जाते थे। अर्दली बाजार भी उस दौर में बेहद संवेदनशील इलाका माना जाता था। दवा मंडी अपराधियों के लिए सोने की खान थी। नकली दवाओं के कारोबार से आने वाली रकम माफियाओं को आकर्षित करती थी। असल समस्या यह थी कि छोटे शूटर मारे जा रहे थे, लेकिन बड़ों तक कार्रवाई नहीं हो रही थी।
इसी बीच अन्नू त्रिपाठी भी यूपी छोड़कर बाहर रहने लगा। लेकिन, उसके तैयार किए गए लड़के अब खुद अपराध की दुनिया में उतर चुके थे। ये ऐसे शूटर थे जो शुरुआत में सिर्फ रोजमर्रा के खर्च और शौक पूरे करने के लिए हत्या करते थे। इसी बीच अन्नू त्रिपाठी ने तय किया कि अब वह चुनाव लड़ेगा। उसने खुद को नेता बनाने की पटकथा लिखी। दिल्ली में तमंचा दिखाकर जानबूझकर खुद को गिरफ्तार कराया ताकि उसे यूपी की जेल में शिफ्ट किया जाए। दिल्ली से नैनी जेल और फिर सेंट्रल जेल शिवपुर।
उसी जेल में सात साल की सजा काट रहा था एक मामूली कैदी, संतोष गुप्ता उर्फ किट्टू। किसी माफिया गिरोह ने किट्टू से संपर्क किया। जेल के अंदर ही उसे पिस्टल पहुंचाई गई और 2005 में सुपारी लेकर उसने अन्नू त्रिपाठी की हत्या कर दी। उसी साल पेशी के दौरान सुल्तानपुर में रेलवे क्रॉसिंग के पास पुलिस गाड़ी से कूदकर वह फरार हो गया। इसके बाद उसने पूर्वांचल में रंगदारी का नेटवर्क खड़ा करना शुरू कर दिया। 2001 से 2006 के बीच पूर्वांचल खून और बारूद के सबसे हिंसक दौर से गुजर रहा था।
इसी बीच एक नया नाम आया गुड्डू यादव का। उसे मिनी माफिया कहा जाता था। सफेदपोश अंदाज, गाड़ियों का काफिला और साथ में असलहाधारी लोग। उसने जौनपुर के मड़ियाहूं में एके-47 से पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष राजकुमार सिंह और पूर्व ब्लॉक प्रमुख पंडितजी की हत्या की थी। साल 2006 में वह बनारस कचहरी तारीख पर आया था। बाहर निकला तो कई गाड़ियां उसके साथ थीं। वह अर्दली बाजार स्थित अपने एक दोस्त के घर जा रहा था। तभी पुलिस चौकी के सामने एक सफेद सेंट्रो कार आकर रुकी। उसमें वर्दीधारी लोग थे। एक वर्दीधारी एके-47 लेकर बाहर उतरा और उसने पूरा काफिला रोक दिया। उसने पूछा गुड्डू यादव कौन है? गुड्डू ने खुद की पहचान बताई। वर्दीधारी ने कहा एसटीएफ से हैं, नीचे उतरो।
भीड़ को लगा कि असली पुलिस है। गुड्डू को गाड़ी में बैठा लिया गया। कुछ देर बाद गुड्डू से फोन कराया गया कि पीछे आ रही गाड़ियों को वापस भेज दो... नहीं तो यहीं एनकाउंटर कर देंगे। गुड्डू ने अपने लोगों को लौट जाने को कहा। इसके बाद उसे बाबतपुर ले जाया गया और सड़क किनारे गोलियों से भून दिया गया। लेकिन, पता नहीं चला किसने मारा। साल 2007 में इस हत्या का आरोपी राजन तिवारी पकड़ा गया। उसने कबूल किया कि गुड्डू यादव की हत्या उसी ने की थी।
उसने बताया कि वह बीटेक कर चुका है। जौनपुर में जिस पूर्व ब्लॉक प्रमुख की हत्या गुड्डू यादव ने की थी, वह उसका मामा था। बचपन में उसने अपने परिवार को टूटते देखा था और उसी दिन बदला लेने की ठान ली थी। जेल से छूटने के बाद राजन तिवारी खुद बड़े स्तर पर रंगदारी करने लगा। यहां तक कि उसने पुलिस अफसरों को धमकाना शुरू कर दिया। आखिरकार 2009 में एक मुठभेड़ में वह मारा गया। 2017 के बाद तस्वीर बदलनी शुरू हुई। संगठित अपराध की जड़ों पर कार्रवाई हुई। माफिया नेटवर्क टूटने लगे। साल 2017 के बाद संगठित अपराध समाप्त हो गए, लगभग रंगदारी का दौर खत्म हो चुका है। -संतोष कुमार सिंह, रिटायर्ड आईपीएस