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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   25 Days, 25 Stories Har Har Mahadev and Allahu Akbar Resounded Together Kashi Fascinating Reminiscences

25 दिन-25 कहानियां: जब काशी में साथ गूंजे थे ‘हर हर महादेव’ और ‘अल्लाह हू अकबर’, पढ़ें दिलचस्प यादें

Fri, 22 May 2026 11:58 AM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Fri, 22 May 2026 11:58 AM IST
सार

मुफ्ती ए बनारस मौलाना अब्दुल बातिन नोमानी ने बताया कि एक वक्त ऐसा भी था जब मुस्लिम बिना किसी खौफ के गंगा के पवित्र जल से वजू करते थे। घाटों पर बैठते थे। परिवार के साथ नाव की सैर करते थे। ज्ञानवापी में हिंदू भी आते-जाते थे, चबूतरे पर बैठते थे, बातचीत करते थे। कोई बैरिकेडिंग नहीं थी। इतनी फोर्स भी वहां नहीं होती थी। बस लोग होते थे क्योंकि रिश्ता था और भरोसा था। लेकिन, 1991 के बाद हालात धीरे-धीरे बदलने लगे। 

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25 Days, 25 Stories Har Har Mahadev and Allahu Akbar Resounded Together Kashi Fascinating Reminiscences
मुफ्ती ए बनारस मौलाना अब्दुल बातिन नोमानी। - फोटो : संवाद

विस्तार

साल 2005...। ज्ञानवापी का इलाका। भीड़, आवाजाही और रोज की तरह चलती जिंदगी। इसी दौरान किसी बात को लेकर वहां तैनात सिक्योरिटी कर्मियों ने मेरे साथ बदसलूकी कर दी। मामला बढ़ा तो बात सीधे सद्भावना कमेटी तक पहुंची। इसके बाद जो हुआ, वही बनारस की असली कहानी है।

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उस वक्त श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत परिवार से जुड़े महंत राजेंद्र तिवारी और महंत बबलू गुरु खुद वहां पहुंचे। उनके साथ कई हिंदू समाज के लोग भी थे। दूसरी ओर मुस्लिम समाज के लोग भी इकट्ठा थे। फिर अचानक वहां एक साथ मेरी हिमायत में हर हर महादेव... और अल्लाह हू अकबर... गूंज उठा। दोनों तरफ के लोग एक साथ खड़े होकर सिक्योरिटी कर्मियों के खिलाफ आवाज उठाने लगे। आखिरकार जिसने बदसलूकी की थी, उसने अपनी गलती मानी। 

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मामला तो वहीं खत्म हो गया, लेकिन वह दिन आज भी यादों में जिंदा है। यही बनारस था, जहां मजहब से पहले इंसान खड़ा होता था। 2004 में बनी सद्भावना कमेटी उस दौर में शहर की फिजा संभालने का बड़ा जरिया बनी थी। फिर आया साल 2006...। संकटमोचन मंदिर में बम धमाके हुए। पूरा शहर सहमा हुआ था। गुस्सा था, डर था, बेचैनी थी। ऐसा लग रहा था कि एक चिंगारी पूरे शहर को जला सकती है। 

मैं अपनी पूरी टीम के साथ सीधे संकटमोचन मंदिर पहुंचा। वहां उस समय के महंत प्रो. वीरभद्र मिश्र से मुलाकात की। अगले कई दिनों तक मंदिर परिसर में बैठकों का दौर चला। शहर के सौहार्द को बचाने के लिए हिंदू और मुस्लिम दोनों समाज के लोग साथ बैठे। कुछ लोग माहौल बिगाड़ने भी पहुंचे थे। मंदिर परिसर में धरना देने की कोशिश हुई लेकिन महंत प्रो. वीरभद्र मिश्र ने बेहद सख्ती के साथ उन्हें वहां से हटवा दिया। वजह सिर्फ एक थी काशी की फिजा खराब नहीं होनी चाहिए।  

एक वक्त ऐसा भी था जब मुस्लिम बिना किसी खौफ के गंगा के पवित्र जल से वजू करते थे। घाटों पर बैठते थे। परिवार के साथ नाव की सैर करते थे। ज्ञानवापी में हिंदू भी आते-जाते थे, चबूतरे पर बैठते थे, बातचीत करते थे। कोई बैरिकेडिंग नहीं थी। इतनी फोर्स भी वहां नहीं होती थी। बस लोग होते थे क्योंकि रिश्ता था और भरोसा था। लेकिन, 1991 के बाद हालात धीरे-धीरे बदलने लगे। 

बैरिकेडिंग आई, दूरियां बढ़ीं और फिर सियासत ने उन दूरियों को और चौड़ा कर दिया। नफरत की सियासत ने लोगों के दिलों के बीच दीवारें खड़ी कर दीं। अब मुस्लिम परिवार पहले की तरह घाटों पर कम जाते हैं। गंगा किनारे बैठने का वह अपनापन कम हुआ है। बनारस की रूह मानी जाने वाली बनारसी साड़ी का दमखम भी कम हुआ है। 

असली बनारसी बुनकरों का काम बुरी तरह प्रभावित हुआ है। बाजार में नकली बनारसी साड़ियों की भरमार हो गई है। मशीनों और कॉपी डिजाइनों ने असल हुनर को पीछे धकेल दिया। कारीगर टूट गया। बहुत से बुनकर सूरत और बंगलूरू चले गए। वहीं जाकर काम करने लगे। इस एंड्रायड मोबाइल ने भी बड़ा ताना-बाना बिगाड़ा है। पहले शादी-ब्याह या किसी दावत का न्योता देने लोग खुद घर-घर जाते थे। दरवाजे पर बैठते थे। चाय पीते थे। हालचाल पूछते थे। रिश्ते मजबूत होते थे। अब एक मेसेज जाता है और रस्म पूरी हो जाती है।

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