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तालमेल में हो गया लाखों का घालमेल
Updated Mon, 02 Apr 2018 01:12 AM IST
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ज्ञानपुर। ग्रामीण स्वास्थ्य स्वच्छता एवं पोषण समिति के तहत ग्राम पंचायतों को हर साल मिलने वाली धनराशि में तालमेल से 56 लाख का खेल हो गया। जिम्मेदार ही योजनाओं का पलीता लगा रहे हैं। कुछ माह पूर्व मलेरिया विभाग की जांच में यह बात सामने आई तो विभाग अवाक रह गया। पंचायत प्रतिनिधि से लेकर एएनम तक खुद से बचने के लिए एक दूसरे पर पल्ला झाड़ते दिखे, हालांकि प्रशासनिक स्तर से इसमें ठोस कार्रवाई अब तक नहीं हो सकी।
गांवों में स्वच्छता के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही है। जिनमें कुछ ऐसी भी योजना है जिनके बारे में किसी को पता भी नहीं चलता और जिम्मेदार कर्मी राशि को गटक जाते हैं। मजे की बात तो यह कि धरातल पर खर्च किए बगैर इस राशि का बंदरबांट ऐसे गोपनीय तरीके से होता है कि इसकी भनक तक किसी को नहीं लग पाती। नागरिकों के स्वास्थ्य एवं स्वच्छता को लेकर हर साल गावों में 10-10 हजार भेजा जाता है। जिले के 561 ग्रामसभाओं में करीब 56 लाख 10 हजार रुपये वित्तीय वर्ष में भेजा गया। इससे गंदे पानी में डीडीटी छिड़काव, कुओं में ब्लीचिंग छिड़काव के साथ ही नाली की साफ-सफाई की जाती है लेकिन कुछ गिने-चुने गावों को छोड़ दिया जाए तो 99 फीसदी गावों में कमोबेश एक ही स्थिति है। कहने को को धनराशि खर्च करने के लिए समिति का गठन किया जाता है लेकिन सारा कामकाज एएनम और प्रधान के जिम्मे रहता है। दोनों के तालमेल से गावों में मिलने वाली यह रकम बिना खर्च किए ही खत्म हो जाता है।
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गांवों में स्वच्छता के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही है। जिनमें कुछ ऐसी भी योजना है जिनके बारे में किसी को पता भी नहीं चलता और जिम्मेदार कर्मी राशि को गटक जाते हैं। मजे की बात तो यह कि धरातल पर खर्च किए बगैर इस राशि का बंदरबांट ऐसे गोपनीय तरीके से होता है कि इसकी भनक तक किसी को नहीं लग पाती। नागरिकों के स्वास्थ्य एवं स्वच्छता को लेकर हर साल गावों में 10-10 हजार भेजा जाता है। जिले के 561 ग्रामसभाओं में करीब 56 लाख 10 हजार रुपये वित्तीय वर्ष में भेजा गया। इससे गंदे पानी में डीडीटी छिड़काव, कुओं में ब्लीचिंग छिड़काव के साथ ही नाली की साफ-सफाई की जाती है लेकिन कुछ गिने-चुने गावों को छोड़ दिया जाए तो 99 फीसदी गावों में कमोबेश एक ही स्थिति है। कहने को को धनराशि खर्च करने के लिए समिति का गठन किया जाता है लेकिन सारा कामकाज एएनम और प्रधान के जिम्मे रहता है। दोनों के तालमेल से गावों में मिलने वाली यह रकम बिना खर्च किए ही खत्म हो जाता है।
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