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सूख रही गंगा, गहराएगा जल संकट
Updated Thu, 08 Mar 2018 01:16 AM IST
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सीतामढ़ी। आर्सेनिक और अत्यधिक आयरन युक्त पानी की समस्या से जूझ रहे गंगा तट के कोनिया क्षेत्र के करीब डेढ़ दर्जन गांवों के लोगों को इस गर्मी में पेयजल संकट से जूझना पड़ सकता है। इस क्षेत्र के गांवों का भूजल स्तर गंगा पर ही निर्भर है। ऐसे में गंगा के घटते जलस्तर को देखते हुए आशंका बढ़ गई है कि मई-जून में इन गांवों के कुओं और हैंडपंपों का जलस्तर खिसक कर काफी नीचे जा सकता है।
इस वर्ष गंगा के जल स्तर में तेजी से कमी हो रही है, जिसके कारण बीच धारा में रेत के टीले उभर आए हैं। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार छह मार्च 2017 को सीतामढ़ी में गंगा का जलस्तर 5.440 मीटर था जबकि इस वर्ष जलस्तर एक मीटर नीचे पहुंच गया है। बुधवार को गंगा का जलस्तर 4.430 मीटर दर्ज किया गया। इसको देखते हुए क्षेत्र के ग्रामीणों में चिंता बढ़ गई है। उनका कहना है कि जब मार्च में गंगा की यह दशा है तो मई-जून में हालात और खराब हो सकते हैं। एक दशक पहले वर्ष 2008 में 16 मई को गंगा का जलस्तर न्यूनतम 3.360 मीटर पहुंच था। उस वर्ष कोनिया के कई गांवों के हैंडपंपों ने पानी देना बंद कर दिया था और कुएं भी सूख गए थे। इस बार मार्च में ही गंगा पर टीले निकलने से तटवर्ती इलाके के ग्रामीणों की पेसानी पर बल पड़ने लगा है।
तीन ओर से गंगा से घिरे कोनिया क्षेत्र में स्वच्छ पेयजल की अनुपलब्धता गंभीर समस्या बनती जा रही है। एक दशक पूर्व जल निगम ने हैंडपंपों के पानी की जांच कराई थी, जिसमें छेछुआ, भुर्रा, कलिक मवैया, कलातुलसी आदि गांवों के पानी में आर्सेनिक पाया गया। इसी तरह धनतुलसी, गजाधरपुर, हरिरामपुर, भदरांव, बसगोती मवैया, मवैया थान सिंह, शेरपुर, बहपुरा, कूड़ी कला, कूड़ी खुर्द, भटगवां, इटहरा, डीघ, अरई, खेमापुर, बनकट, नारेपार, बारीपुर, सीतामढ़ी आदि गांवों में हैंडपंपों से अत्यधिक आयरन युक्त और दूषित पानी निकलता है। यही नहीं, गर्मी में गंगा का जलस्तर घटने से हैंडपंप और कुएं सूखने लगते हैं।
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इस वर्ष गंगा के जल स्तर में तेजी से कमी हो रही है, जिसके कारण बीच धारा में रेत के टीले उभर आए हैं। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार छह मार्च 2017 को सीतामढ़ी में गंगा का जलस्तर 5.440 मीटर था जबकि इस वर्ष जलस्तर एक मीटर नीचे पहुंच गया है। बुधवार को गंगा का जलस्तर 4.430 मीटर दर्ज किया गया। इसको देखते हुए क्षेत्र के ग्रामीणों में चिंता बढ़ गई है। उनका कहना है कि जब मार्च में गंगा की यह दशा है तो मई-जून में हालात और खराब हो सकते हैं। एक दशक पहले वर्ष 2008 में 16 मई को गंगा का जलस्तर न्यूनतम 3.360 मीटर पहुंच था। उस वर्ष कोनिया के कई गांवों के हैंडपंपों ने पानी देना बंद कर दिया था और कुएं भी सूख गए थे। इस बार मार्च में ही गंगा पर टीले निकलने से तटवर्ती इलाके के ग्रामीणों की पेसानी पर बल पड़ने लगा है।
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तीन ओर से गंगा से घिरे कोनिया क्षेत्र में स्वच्छ पेयजल की अनुपलब्धता गंभीर समस्या बनती जा रही है। एक दशक पूर्व जल निगम ने हैंडपंपों के पानी की जांच कराई थी, जिसमें छेछुआ, भुर्रा, कलिक मवैया, कलातुलसी आदि गांवों के पानी में आर्सेनिक पाया गया। इसी तरह धनतुलसी, गजाधरपुर, हरिरामपुर, भदरांव, बसगोती मवैया, मवैया थान सिंह, शेरपुर, बहपुरा, कूड़ी कला, कूड़ी खुर्द, भटगवां, इटहरा, डीघ, अरई, खेमापुर, बनकट, नारेपार, बारीपुर, सीतामढ़ी आदि गांवों में हैंडपंपों से अत्यधिक आयरन युक्त और दूषित पानी निकलता है। यही नहीं, गर्मी में गंगा का जलस्तर घटने से हैंडपंप और कुएं सूखने लगते हैं।
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