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शिक्षा की दीप ज्योति से बाबू संपूर्णानंद ने अलख जगाई
Updated Mon, 01 Jan 2018 02:37 AM IST
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वाराणसी। दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री और साहित्यकार डॉ. संपूर्णानंद को राष्ट्र निर्माण की दिशा में किए गए कार्यों के लिए हमेशा याद किया जाएगा। खासतौर से देवभाषा संस्कृत के उत्थान और तीर्थनगरी में वेद, वेदांत, वेदांग, और व्याकरण के प्रकांड विद्वान तैयार करने के लिए उनकी भूमिका को कोई नहीं भुला सकता।
महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में जहां उन्होंने अध्यापन कार्य किया वहीं यहां से होने वाले स्वतंत्रता आंदोलनों में भी बढ़-चढ़ कर भागीदारी भी की थी। संस्कृत भाषा के उत्थान के लिए जिस संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय की उन्होंने स्थापना की, उससे संबद्ध केवल यूपी हीं नहीं बल्कि देश के विभिन्न प्रांतों में मिलाकर करीब 500 कॉलेज हैं, जहां विद्यार्थी संस्कृत की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
एक जनवरी, 1890 को बनारस में जन्मे डॉ. संपूर्णानंद क्वींस कॉलेज से बीएससी की परीक्षा पास करने के बाद प्रयाग चले गए। यहां से वृंदावन, बीकानेर कॉलेज में शिक्षक की नौकरी करने के बाद देश सेवा के लिए नौकरी छोड़ते हुए बाबू शिवप्रसाद गुप्त जी के बुलावे पर फिर काशी आए और ज्ञानमंडल में काम शुरू कर दिया। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में वह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आमंत्रण पर आए और शिक्षण कार्य किया। बाद में उन्होंने चांसलर के रूप में सेवा भी की।
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जहां तक संस्कृत विश्वविद्यालय की बात है, 1791 में शासकीय संस्कृत महाविद्यालय के रुप में जाना जाता था। बतौर मुख्यमंत्री डॉ. संपूर्णानंद ने 22 मार्च, 1958 को इसे संस्कृत विश्वविद्यालय का दर्जा दिलवाया। तब इसका नाम वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय था। 1974 में इसका नाम बदलकर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय किया गया।
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महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में जहां उन्होंने अध्यापन कार्य किया वहीं यहां से होने वाले स्वतंत्रता आंदोलनों में भी बढ़-चढ़ कर भागीदारी भी की थी। संस्कृत भाषा के उत्थान के लिए जिस संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय की उन्होंने स्थापना की, उससे संबद्ध केवल यूपी हीं नहीं बल्कि देश के विभिन्न प्रांतों में मिलाकर करीब 500 कॉलेज हैं, जहां विद्यार्थी संस्कृत की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
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एक जनवरी, 1890 को बनारस में जन्मे डॉ. संपूर्णानंद क्वींस कॉलेज से बीएससी की परीक्षा पास करने के बाद प्रयाग चले गए। यहां से वृंदावन, बीकानेर कॉलेज में शिक्षक की नौकरी करने के बाद देश सेवा के लिए नौकरी छोड़ते हुए बाबू शिवप्रसाद गुप्त जी के बुलावे पर फिर काशी आए और ज्ञानमंडल में काम शुरू कर दिया। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में वह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आमंत्रण पर आए और शिक्षण कार्य किया। बाद में उन्होंने चांसलर के रूप में सेवा भी की।
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जहां तक संस्कृत विश्वविद्यालय की बात है, 1791 में शासकीय संस्कृत महाविद्यालय के रुप में जाना जाता था। बतौर मुख्यमंत्री डॉ. संपूर्णानंद ने 22 मार्च, 1958 को इसे संस्कृत विश्वविद्यालय का दर्जा दिलवाया। तब इसका नाम वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय था। 1974 में इसका नाम बदलकर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय किया गया।