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भारतीय संस्कृति सबसे पुरानी
Updated Tue, 18 Dec 2018 01:40 AM IST
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वाराणसी। महर्षि संदिपनी वेद विद्या प्रतिष्ठान उज्जैन, वैदिक विज्ञान केंद्र काशी हिंदू विश्वविद्यालय और श्री ब्रह्मा वेद विद्यालय के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित त्रिदिवसीय अखिल भारतीय वैदिक सम्मेलन का सोमवार को समापन हुआ।
अस्सी के पुष्कर तालाब स्थित ब्रह्मा वेद विद्यालय में आयोजित समापन समारोह का शुभारंभ मुख्य अतिथि पश्चिम बंगाल के राज्यपाल डॉ. केसरीनाथ त्रिपाठी, बीएचयू के कुलपति प्रो. राकेश भटनागर, विशिष्ट अतिथि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन करके किया।
राज्यपाल ने कहा कि मध्य और आधुनिक युग में पश्चात संस्कृति व अज्ञानता के कारण वेद पर चर्चा करना हीन भावना समझी जाती थी लेकिन आज वेद पर चर्चा की आवश्यकता है। भारतीय संस्कृति सबसे पुरानी है। मुगल काल का इतिहास 14 सौ वर्ष पहले, ईशा का इतिहास 2000 बरस पहले मिलता है और भारत का इतिहास 5000 बरस पहले से है। इसलिए वेद विज्ञान में सभी समस्याओं का समाधान और उसका उत्तर है।
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विशिष्ट अतिथि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि वेद हमारे बीज हैं। हमारी आत्मा हैं, इनके बिना हमारा जीवन मृत प्राय है। अगर इस संसार को भारतीय समाज को बचाना है तो प्राण रूपी वेद को विस्तारित करना होगा।
बतौर अध्यक्ष बीएचयू के कुलपति ने कहा कि वेद हमारे प्राचीन संस्कृति और सभ्यता के प्रतीक हैं। इस पर बड़े स्तर पर शोध की जरूरत है। सामाजिक कार्यकर्ता रामयश मिश्रा ने कहा कि पाश्चात्य संस्कृति के मोह जाल में फंस कर हम अपने वेद, पुराण और संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। केंद्र के समन्वयक प्रो. उपेंद्र त्रिपाठी ने तीन दिवसीय संगोष्ठी की समीक्षा की। राम निरंजन दास, प्रो. ह्रदय रंजन शर्मा, प्रो. राममूर्ति चतुर्वेदी, सारस्वत अतिथि महर्षि संदिपनी राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान के सचिव प्रो. विरुपाक्ष जद्दी पाल, सदस्य नंदजी पांडे, डॉ. अरविंद त्रिपाठी, जीसी त्रिपाठी आदि उपस्थित रहे।
इस अवसर पर डॉ. उपेंद्र कुमार त्रिपाठी, ब्रह्मा वेद विद्यालय के सचिव राम शरण दास ने राज्यपाल का माल्यार्पण व स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया। संचालन पांडुरंग लक्ष्मीकांत पुराणिक और प्रो. राममूर्ति चतुर्वेदी ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
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अस्सी के पुष्कर तालाब स्थित ब्रह्मा वेद विद्यालय में आयोजित समापन समारोह का शुभारंभ मुख्य अतिथि पश्चिम बंगाल के राज्यपाल डॉ. केसरीनाथ त्रिपाठी, बीएचयू के कुलपति प्रो. राकेश भटनागर, विशिष्ट अतिथि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन करके किया।
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राज्यपाल ने कहा कि मध्य और आधुनिक युग में पश्चात संस्कृति व अज्ञानता के कारण वेद पर चर्चा करना हीन भावना समझी जाती थी लेकिन आज वेद पर चर्चा की आवश्यकता है। भारतीय संस्कृति सबसे पुरानी है। मुगल काल का इतिहास 14 सौ वर्ष पहले, ईशा का इतिहास 2000 बरस पहले मिलता है और भारत का इतिहास 5000 बरस पहले से है। इसलिए वेद विज्ञान में सभी समस्याओं का समाधान और उसका उत्तर है।
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विशिष्ट अतिथि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि वेद हमारे बीज हैं। हमारी आत्मा हैं, इनके बिना हमारा जीवन मृत प्राय है। अगर इस संसार को भारतीय समाज को बचाना है तो प्राण रूपी वेद को विस्तारित करना होगा।
बतौर अध्यक्ष बीएचयू के कुलपति ने कहा कि वेद हमारे प्राचीन संस्कृति और सभ्यता के प्रतीक हैं। इस पर बड़े स्तर पर शोध की जरूरत है। सामाजिक कार्यकर्ता रामयश मिश्रा ने कहा कि पाश्चात्य संस्कृति के मोह जाल में फंस कर हम अपने वेद, पुराण और संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। केंद्र के समन्वयक प्रो. उपेंद्र त्रिपाठी ने तीन दिवसीय संगोष्ठी की समीक्षा की। राम निरंजन दास, प्रो. ह्रदय रंजन शर्मा, प्रो. राममूर्ति चतुर्वेदी, सारस्वत अतिथि महर्षि संदिपनी राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान के सचिव प्रो. विरुपाक्ष जद्दी पाल, सदस्य नंदजी पांडे, डॉ. अरविंद त्रिपाठी, जीसी त्रिपाठी आदि उपस्थित रहे।
इस अवसर पर डॉ. उपेंद्र कुमार त्रिपाठी, ब्रह्मा वेद विद्यालय के सचिव राम शरण दास ने राज्यपाल का माल्यार्पण व स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया। संचालन पांडुरंग लक्ष्मीकांत पुराणिक और प्रो. राममूर्ति चतुर्वेदी ने धन्यवाद ज्ञापन किया।