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...तो प्रदूषण से नहीं मरीं, बह कर आ गईं मछलियां0
Updated Tue, 24 Apr 2018 01:52 AM IST
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वाराणसी। ललिता घाट पर मछलियों की मौत के मामले में प्रदूषण नियंत्रण विभाग ने प्रदूषण को इसके लिए जिम्मेदार नहीं माना है। प्रदूषण नियंत्रण विभाग की रिपोर्ट में ललिता घाट पर घुलनशील ऑक्सीजन की मात्रा मानक से अधिक है। विभाग के अधिकारियों का कहना है कि मछलियों की मौत का कारण किसी की शरारत है। वहीं, नदी वैज्ञानिकों का कहना है कि मछलियों की मौत का मामला गंभीर है और इसकी पूरी तरह से जांच होनी चाहिए।
ललिता घाट पर 19 अप्रैल को मछलियों की मौत में प्रदूषण नियंत्रण विभाग की रिपोर्ट तीन दिन में ही आ गई है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी अनिल कुमार सिंह का कहना है कि रिपोर्ट के अनुसार ललिता घाट पर डिजाल्व आक्सीजन (डीओ) की मात्रा 7.2 मिली प्रति लीटर मिली है। इस कारण मछलियों की मौत प्रदूषण के कारण नहीं हुई है। यह किसी की शरारत है या फिर मछलियां कहीं से बहकर गंगा में आ गई थीं।
नदी वैज्ञानिक डॉ. बीडी त्रिपाठी का कहना है कि गंगा जल के जांच की रिपोर्ट आने में पांच दिन का समय लगता है। गंगा में मछलियों के मरने की समस्या बेहद गंभीर समस्या है। इसकी गंभीरता से जांच होनी चाहिए। ललिता घाट पर जांच के दौरान पता चला कि घाट का पानी पूरी तरह से काला पड़ गया था। गंगा के जल में इस गर्मी में 7.2 डीओ होना संभव ही नहीं है।
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ललिता घाट पर 19 अप्रैल को मछलियों की मौत में प्रदूषण नियंत्रण विभाग की रिपोर्ट तीन दिन में ही आ गई है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी अनिल कुमार सिंह का कहना है कि रिपोर्ट के अनुसार ललिता घाट पर डिजाल्व आक्सीजन (डीओ) की मात्रा 7.2 मिली प्रति लीटर मिली है। इस कारण मछलियों की मौत प्रदूषण के कारण नहीं हुई है। यह किसी की शरारत है या फिर मछलियां कहीं से बहकर गंगा में आ गई थीं।
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नदी वैज्ञानिक डॉ. बीडी त्रिपाठी का कहना है कि गंगा जल के जांच की रिपोर्ट आने में पांच दिन का समय लगता है। गंगा में मछलियों के मरने की समस्या बेहद गंभीर समस्या है। इसकी गंभीरता से जांच होनी चाहिए। ललिता घाट पर जांच के दौरान पता चला कि घाट का पानी पूरी तरह से काला पड़ गया था। गंगा के जल में इस गर्मी में 7.2 डीओ होना संभव ही नहीं है।
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