{"_id":"59f4e6a64f1c1b72548b99cb","slug":"151509222054-varanasi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"फिल्मी नगमों के राजकुमार ‘अंजान’ को जयंती पर भूली काशी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
फिल्मी नगमों के राजकुमार ‘अंजान’ को जयंती पर भूली काशी
Updated Sun, 29 Oct 2017 01:58 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पिंडरा। सत्तर के दशक में के बाद ‘ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना...’ ‘खइके पान बनारस वाला...’ और मुझे ‘नौलखा मंगा दे रे ओ सैंया दीवाने...’ जैसे अमर गीत रचकर हर किसी के दिलों पर राज करने वाले गीतकार लालजी पांडेय ‘अंजान’ के प्रति लोगों में दीवानगी अब भी उसी तरह है। गीतों में अंजान भले अमर हो गए लेकिन जयंती पर शनिवार को काशी उन्हें भूल गई। पैतृक गांव पिंडरा के ओदार गांव में भी लोगों को उनकी जयंती याद नहीं रही। मकान में ताला लटकता रहा।
जाने माने गीतकार अंजान पैतृक घऱ पर शनिवार को उनके चचेरे बड़े भाई देवमूरत पांडेय मिले। उन्होंने ‘अमर उजाला’ से बातचीत में अंजान की संगीत यात्रा से जुड़े पहलुओं को साझा किया। अंजान का नाम आते ही वह भावुक हो उठे। पुरानी यादों को ताजा करते हुए उन्होंने बताया कि लालजी को बचपन से ही उनको गाने और लिखने का शौक था। सिनेमा भी खूब देखते थे। उन्होंने बताया कि तब गांव में स्कूल नहीं था। समीप के गांव कोरौत में उनका नाम लिखवाया गया था। वह कक्षा दो तक पढ़ाई करने के बाद उनके पिता उन्हें अपने साथ चौक ले गए। उनके पिता शिवनाथ पांडेय बनारस के चौक में सेंट्रल बैंक में कर्मचारी थे।
गीतों में रमे लालजी का मन बहुत दिनों तक बनारस में नहीं लगा। अंतत: वह मुंबई पहुंचे और फिल्मों के लिए गीत लिखने लगे। करिश्माई व्यक्तित्व के धनी अंजान ने अपने कॅरियर की शुरुआत अमिताभ बच्चन पर फिल्माए गए अपने नगमों से की। 1976 में बनी फिल्म ‘दो अनजाने’ के लिए लिखे उनके गीत लुक छिप लुक छिप जाओ ना.. की कामयाबी के बाद उन्होंने अमिताभ के लिए कई सफल गीत लिखे। जिनमें वर्षों पुराना ये याराना... खून पसीने की जो मिलेगी तो खाएंगे... रोते हुए आते हैं सब... जैसे सहाबहार गीत शामिल हैं। अंजान के छोटे पुत्र गीतकार समीर फिल्म जगत में उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, जबकि छोटे पुत्र चंद्रशेखर बनारस में रहते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
जाने माने गीतकार अंजान पैतृक घऱ पर शनिवार को उनके चचेरे बड़े भाई देवमूरत पांडेय मिले। उन्होंने ‘अमर उजाला’ से बातचीत में अंजान की संगीत यात्रा से जुड़े पहलुओं को साझा किया। अंजान का नाम आते ही वह भावुक हो उठे। पुरानी यादों को ताजा करते हुए उन्होंने बताया कि लालजी को बचपन से ही उनको गाने और लिखने का शौक था। सिनेमा भी खूब देखते थे। उन्होंने बताया कि तब गांव में स्कूल नहीं था। समीप के गांव कोरौत में उनका नाम लिखवाया गया था। वह कक्षा दो तक पढ़ाई करने के बाद उनके पिता उन्हें अपने साथ चौक ले गए। उनके पिता शिवनाथ पांडेय बनारस के चौक में सेंट्रल बैंक में कर्मचारी थे।
विज्ञापन
गीतों में रमे लालजी का मन बहुत दिनों तक बनारस में नहीं लगा। अंतत: वह मुंबई पहुंचे और फिल्मों के लिए गीत लिखने लगे। करिश्माई व्यक्तित्व के धनी अंजान ने अपने कॅरियर की शुरुआत अमिताभ बच्चन पर फिल्माए गए अपने नगमों से की। 1976 में बनी फिल्म ‘दो अनजाने’ के लिए लिखे उनके गीत लुक छिप लुक छिप जाओ ना.. की कामयाबी के बाद उन्होंने अमिताभ के लिए कई सफल गीत लिखे। जिनमें वर्षों पुराना ये याराना... खून पसीने की जो मिलेगी तो खाएंगे... रोते हुए आते हैं सब... जैसे सहाबहार गीत शामिल हैं। अंजान के छोटे पुत्र गीतकार समीर फिल्म जगत में उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, जबकि छोटे पुत्र चंद्रशेखर बनारस में रहते हैं।
विज्ञापन