{"_id":"59989ce94f1c1bee448b4568","slug":"151503173865-varanasi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"जंग-ए-आजादी में उलेमा का भी रहा अहम रोल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जंग-ए-आजादी में उलेमा का भी रहा अहम रोल
Updated Sun, 20 Aug 2017 01:47 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
वाराणसी। जमीअत उलेमा जिला बनारस की ओर से शनिवार को रेवड़ीतालाब स्थित कुदरतुल्लाह गुलजारे तालीम नर्सरी एंड गर्ल्स स्कूल में ‘जंग-ए-आजादी में उलेमा का किरदार’ पर जलसा हुआ जिसमें उन उलेमा को याद किया जिन्होंने जंग-ए-आजादी में अपना अहम रोल अदा किया। रात नौ बजे शुरू हुए इस जलसे में मुख्य अतिथि मौलाना सैयद अजहर मदनी ने कहा कि इस मुल्क की आजादी में हमारे बुजुर्गों ने अजीम कुर्बानी दी है। 1757 में नवाब सिराजुद्दौला ने पलासी के मैदान में अंग्रेजों से मुकाबला किया। वो बात अलग है कि उन्हें कामयाबी नहीं मिल सकी।
उनके बाद हैदर अली और उनके बेटे टीपू सुलतान ने अंग्रेजों से जंग लड़ी और उन्हें हर मोड़ पर शिकस्त दी। 1803 के बाद पूरे मुल्क में मुसलमानों ने आजादी के लिए जिहाद किया। 1831 फिर 1857 में हाजी इमदादुल्लाह और उनके साथ मौलाना कासिम नानवती, मौलाना रसीद अहमद गंगोली, जामिन शहीद जैसे उलेमा ने शामली के मैदान में अंग्रेजों से मुकाबला किया। शैखुल हिंद मौलाना महमूद हसन देवबंदी, मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना अजीज गुल, मौलाना मंसूर अंसारी, मौलाना फजले हक ने माल्टा की कैद की मशक्कत झेली। मौलाना मदनी ने कहा कि अब ये हमारी जिम्मेदारी है कि अपने उलेमा की कुर्बानियों की कद्र करें और उसकी हिफाजत के लिए प्यार और मुहब्बत की तारीख को जिंदा करें।
मौलाना नूरुल हसन कासमी ने कहा कि हमारे बुजुर्गों ने जो अपनी बेमिसाल कुर्बानियों से आजादी का तोहफा दिया है उसे आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाएं। मुफ्ती-ए-शहर मौलाना अब्दुल बातिन नोमानी ने फिरकापरस्ती और नफरत को खत्म कर लोगों को ये बताने की जरूरत है कि जिस तरह हमने एक होकर आजादी हासिल की है, उसी तरह एक होकर उस आजादी की हिफाजत करें। अध्यक्षता मौलाना अब्दुल्ला नासिर कासमी ने की। संचालन मौलाना रियाजुद्दीन नोमानी ने किया। स्वागत अब्दुल्ला फैसल ने किया। इस मौके पर हाफिज सुहैल, हाजी बाबूलाल, हाफिज मुईद, अब्दुल बासित, सलीम अख्तर, इशरत उस्मानी, अब्दुल अजीज, मंजूर आफाक आदि मौजूद रहे।
विज्ञापन
विज्ञापन
उनके बाद हैदर अली और उनके बेटे टीपू सुलतान ने अंग्रेजों से जंग लड़ी और उन्हें हर मोड़ पर शिकस्त दी। 1803 के बाद पूरे मुल्क में मुसलमानों ने आजादी के लिए जिहाद किया। 1831 फिर 1857 में हाजी इमदादुल्लाह और उनके साथ मौलाना कासिम नानवती, मौलाना रसीद अहमद गंगोली, जामिन शहीद जैसे उलेमा ने शामली के मैदान में अंग्रेजों से मुकाबला किया। शैखुल हिंद मौलाना महमूद हसन देवबंदी, मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना अजीज गुल, मौलाना मंसूर अंसारी, मौलाना फजले हक ने माल्टा की कैद की मशक्कत झेली। मौलाना मदनी ने कहा कि अब ये हमारी जिम्मेदारी है कि अपने उलेमा की कुर्बानियों की कद्र करें और उसकी हिफाजत के लिए प्यार और मुहब्बत की तारीख को जिंदा करें।
विज्ञापन
मौलाना नूरुल हसन कासमी ने कहा कि हमारे बुजुर्गों ने जो अपनी बेमिसाल कुर्बानियों से आजादी का तोहफा दिया है उसे आने वाली पीढ़ी तक पहुंचाएं। मुफ्ती-ए-शहर मौलाना अब्दुल बातिन नोमानी ने फिरकापरस्ती और नफरत को खत्म कर लोगों को ये बताने की जरूरत है कि जिस तरह हमने एक होकर आजादी हासिल की है, उसी तरह एक होकर उस आजादी की हिफाजत करें। अध्यक्षता मौलाना अब्दुल्ला नासिर कासमी ने की। संचालन मौलाना रियाजुद्दीन नोमानी ने किया। स्वागत अब्दुल्ला फैसल ने किया। इस मौके पर हाफिज सुहैल, हाजी बाबूलाल, हाफिज मुईद, अब्दुल बासित, सलीम अख्तर, इशरत उस्मानी, अब्दुल अजीज, मंजूर आफाक आदि मौजूद रहे।
विज्ञापन