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कालीन उद्योग जीएसटी से मुक्त नहीं
Updated Wed, 07 Jun 2017 01:15 AM IST
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भदोही। विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) के अंतर्गत आने के बाद भी कालीन उद्योग जीएसटी से मुक्त नहीं है, जबकि इसके अंतर्गत आने वाले बाकी हस्तशिल्प उत्पादों समेत बनारसी साड़ी को जीएसटी से मुक्त रखा गया है। इस पर अखिल भारतीय कालीन निर्माता संघ (एकमा) की साधारण सभा में मंगलवार को नाराजगी जताई गई। साथ ही इसके लिए विकास आयुक्त, हस्तशिल्प (डीसीएच) के समक्ष उठाने का निर्णय लिया गया। ये बातें एकमा अध्यक्ष गुलाम सर्फुद्दीन अंसारी ने कालीन भवन में एक प्रेस वार्ता में कही।
एकमाध्यक्ष ने कहा कि कालीन उद्योग न केवल असंगठित क्षेत्र में आता है, बल्कि यह कुटीर उद्योग भी है। पूरा उद्योग आश्वस्त था कि सरकार कालीन उद्योग को जीएसटी से मुक्त रखेगी। बनारसी साड़ी समेत हस्तशिल्प के सभी उत्पादों को जीएसटी से बाहर तो कर दिया गया, लेकिन कालीन पर 12 प्रतिशत जीएसटी थोप दिया गया। उन्होंने कहा कि असंगठित क्षेत्र होने के नाते कालीन उद्योग पर जीएसटी से कालीनें महंगी हो जाएंगी, जिसका सीधा असर निर्यात पर पड़ेगा।
मानद सचिव, पीयूष बरनवाल ने बताया कि कच्चा माल खरीद के अलावा किसी भी प्रकार की मजदूरी भुगतान पर जीएसटी देना होगा। बुनाई, धुलाई, पेचाई, कटाई, लेटेक्सिंग आदि की मजदूरी पर 12 प्रतिशत जीएसटी उत्पादक को ही देना होगा। कुल मिलाकर कालीन बनाकर निर्यात करने तक का पूरा काम महंगा हो जाएगा। उपाध्यक्ष शिवसागर तिवारी ने बताया कि सरकार को कालीन निर्यात का प्रमाण देने पर जीएसटी रिफंड होगा, लेकिन यह एक लंबी प्रक्रिया हो जाएगी। इससे उद्योग पर काफी बोझ बढ़ जाएगा। वार्ता में मौजूद वरिष्ठ सदस्य, भोलानाथ बरनवाल ने कहा कि बनारसी साड़ी अथवा अन्य हस्तशिल्प आयटमों से कालीन अलग नहीं है। उन्हें मुक्त रखा गया और कालीन पर जीएसटी थोप दिया गया।
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निर्यातकों ने बताया कि फिलहाल वे विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) से मिलने की तैयारी कर रहै हैं। इसके बाद आगे की योजना बनाई जाएगी। दूसरे संगठनों पूर्वांचल निर्यातक संघ, कालीन निर्यात संवर्धन परिषद, ऑल इंडिया कारपेट यार्न स्पिनर्स एंड डीलर्स एसोसिएशन के साथ बैठक कर भी विचार विमर्श किया जाएगा।
एकमाध्यक्ष ने कहा कि कालीन उद्योग न केवल असंगठित क्षेत्र में आता है, बल्कि यह कुटीर उद्योग भी है। पूरा उद्योग आश्वस्त था कि सरकार कालीन उद्योग को जीएसटी से मुक्त रखेगी। बनारसी साड़ी समेत हस्तशिल्प के सभी उत्पादों को जीएसटी से बाहर तो कर दिया गया, लेकिन कालीन पर 12 प्रतिशत जीएसटी थोप दिया गया। उन्होंने कहा कि असंगठित क्षेत्र होने के नाते कालीन उद्योग पर जीएसटी से कालीनें महंगी हो जाएंगी, जिसका सीधा असर निर्यात पर पड़ेगा।
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मानद सचिव, पीयूष बरनवाल ने बताया कि कच्चा माल खरीद के अलावा किसी भी प्रकार की मजदूरी भुगतान पर जीएसटी देना होगा। बुनाई, धुलाई, पेचाई, कटाई, लेटेक्सिंग आदि की मजदूरी पर 12 प्रतिशत जीएसटी उत्पादक को ही देना होगा। कुल मिलाकर कालीन बनाकर निर्यात करने तक का पूरा काम महंगा हो जाएगा। उपाध्यक्ष शिवसागर तिवारी ने बताया कि सरकार को कालीन निर्यात का प्रमाण देने पर जीएसटी रिफंड होगा, लेकिन यह एक लंबी प्रक्रिया हो जाएगी। इससे उद्योग पर काफी बोझ बढ़ जाएगा। वार्ता में मौजूद वरिष्ठ सदस्य, भोलानाथ बरनवाल ने कहा कि बनारसी साड़ी अथवा अन्य हस्तशिल्प आयटमों से कालीन अलग नहीं है। उन्हें मुक्त रखा गया और कालीन पर जीएसटी थोप दिया गया।
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निर्यातकों ने बताया कि फिलहाल वे विकास आयुक्त (हस्तशिल्प) से मिलने की तैयारी कर रहै हैं। इसके बाद आगे की योजना बनाई जाएगी। दूसरे संगठनों पूर्वांचल निर्यातक संघ, कालीन निर्यात संवर्धन परिषद, ऑल इंडिया कारपेट यार्न स्पिनर्स एंड डीलर्स एसोसिएशन के साथ बैठक कर भी विचार विमर्श किया जाएगा।