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कारोबार बना अवैध वसूली
Updated Thu, 15 Jun 2017 01:27 AM IST
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मुगलसराय। जनपद चंदौली अंतर्गत एनएच दो पर ट्रकों से अवैध वसूली का हिस्सा सिर्फ लखनऊ में बैठे सफेदपोशों को ही नहीं बल्कि इसकी हिस्सेदारी जिले के सफेदपोशों में भी बंटती रही है। हालांकि इसका तरीका बिल्कुल अलग रहा है। सूत्रों के अनुुसार बीते बारह साल में प्रदेश में जिसकी भी सत्ता रही है उसके जिला के नेताओं ने एनएच पर अपने नाम पर ट्रकें पास कराई हैं और इसकी कमाई सीधे उनकेे पास जाती रही है। निलंबित एआरटीओ आरएस यादव के समय में भी खेल जारी था। धीरे- धीरे सफेदपोशों के लिए यह एक कारोबार की शक्ल अख्तियार कर चुका था।
सूत्रों के अनुसार जिला सृजन के बाद से ही ट्रकों से अवैध वूसली के कार्य की शुरूआत हो गई थी लेकिन उस दौरान यह खेल सिर्फ एआरटीओ विभाग के अधिकारियों तक ही सीमित था। वक्त बीतने के साथ इस खेल की भनक धीरे-धीरे सफेदपोशों को लगी। उस दौरान स्थानीय नेताओं ने इसमे दखलंदाजी शुरू की। मामला कहीं फंस न जाए तो अधिकारियों ने कुछ रुपये बतौर महीना देना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे ओवर लोड ट्रकों को पास कराने के कार्य ने एक कारोबार का रूप धारण कर लिया। बीते बारह साल के भीतर इस खेल ने उद्योग का रूप धारण कर लिया जिसमें बिना रुपये खर्च किए सिर्फ सेटिंग के आधार पर हर महीने मोटी रकम मिलने लगी। इन वर्षों में प्रदेश में जिस पार्टी की भी सत्ता रही सभी दलों के जिले के रसूखदार नेताओं ने अपना हाथ आजमाया। सूत्रों के अनुसार हर कार्यकाल में नेताओं को लगभग सौ ट्रकें पास कराने का जिम्मा मिलता था। जिसकी कमाई सीधे उनकी जेब में जाती थी। इसके चलते कभी भी किसी दल ने इसका विरोध नहीं किया।
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सूत्रों के अनुसार जिला सृजन के बाद से ही ट्रकों से अवैध वूसली के कार्य की शुरूआत हो गई थी लेकिन उस दौरान यह खेल सिर्फ एआरटीओ विभाग के अधिकारियों तक ही सीमित था। वक्त बीतने के साथ इस खेल की भनक धीरे-धीरे सफेदपोशों को लगी। उस दौरान स्थानीय नेताओं ने इसमे दखलंदाजी शुरू की। मामला कहीं फंस न जाए तो अधिकारियों ने कुछ रुपये बतौर महीना देना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे ओवर लोड ट्रकों को पास कराने के कार्य ने एक कारोबार का रूप धारण कर लिया। बीते बारह साल के भीतर इस खेल ने उद्योग का रूप धारण कर लिया जिसमें बिना रुपये खर्च किए सिर्फ सेटिंग के आधार पर हर महीने मोटी रकम मिलने लगी। इन वर्षों में प्रदेश में जिस पार्टी की भी सत्ता रही सभी दलों के जिले के रसूखदार नेताओं ने अपना हाथ आजमाया। सूत्रों के अनुसार हर कार्यकाल में नेताओं को लगभग सौ ट्रकें पास कराने का जिम्मा मिलता था। जिसकी कमाई सीधे उनकी जेब में जाती थी। इसके चलते कभी भी किसी दल ने इसका विरोध नहीं किया।
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