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नहीं चेते तो पानी के लिए तरसेंगे काशीवासी
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वाराणसी। बात सुनने में कड़वी जरूर लग रही है, लेकिन सच है कि काशी के लोग अगर नहीं चेते और अपने हक के लिए जागरूक नहीं हुए तो आगे चलकर उनको पानी की समस्याओं से दो चार होना पड़ेेगा। इसकी वजह शहर में प्रतिदिन बर्बाद हो रहा पेयजल है। यह भी कोई थोड़ा- बहुत नहीं बल्कि जितना लोग उपयोग करते हैं उतना ही अधिक बर्बाद होता है। यही स्थित रही तो आने वाले समय में लोग पेयजल के लिए तरस जाएंगे।
20 लाख की आबादी वाले शहर में पेयजल की आपूर्ति के लिए कुल ढ़ाई हजार किमी पाइप लाइन बिछाई गई है। इससे होकर कुल 311 एमएलडी मीलियन लीटर प्रतिदिन पानी की सप्लाई की जाती है, लेकिन इसका आधा ही पानी लोगों तक पहुंच पाता है। बाकी का आधा जल पूरी तरह से बर्बाद जाता है। जलकल द्वारा जारी आंकड़े के अनुसार शहर में मात्र 45 से 50 प्रतिशत तक ही शहर के पेयजल की बिलिंग होती है। जबकि बाकी के सप्लाई का कोई हिसाब जलकल के पास नहीं है और इस बर्बाद जल को जलकल विभाग ने नान रेवेन्यु वाटर के आंकड़ों में डाल रखा है। यही नहीं यह बर्बादी प्रतिदिन होती है और इस बर्बाद जल के चलते ही जलकल की स्थिति यह है कि विकास और नए कार्य तो दूर कर्मचारियों को वेतन देना भी मुश्किल हो जाता है।
शहर में पेयजल की बर्बादी में जलकल का भी रोल है, लेकिन जलकल भी क्या करे, आजादी से पहले की लाइनें भी आज तक बदली नहीं गई हैं। शहर में सप्लाई के लिए जो सबसे कम समय की पाइन लाइन है, वह भी कम से कम 30 साल पुरानी है और अपनी आयु को भी पार कर चुकी हैं। ऐसे में इन सभी पाइप लाइनों को बदलने की जरूरत है। ऐसा भी नहीं है कि शहर में पेयजल की लाइनों को बदलने और उनकी मरम्मत के लिए योजना नहीं बनी लेकिन ये सभी योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गईं।
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20 लाख की आबादी वाले शहर में पेयजल की आपूर्ति के लिए कुल ढ़ाई हजार किमी पाइप लाइन बिछाई गई है। इससे होकर कुल 311 एमएलडी मीलियन लीटर प्रतिदिन पानी की सप्लाई की जाती है, लेकिन इसका आधा ही पानी लोगों तक पहुंच पाता है। बाकी का आधा जल पूरी तरह से बर्बाद जाता है। जलकल द्वारा जारी आंकड़े के अनुसार शहर में मात्र 45 से 50 प्रतिशत तक ही शहर के पेयजल की बिलिंग होती है। जबकि बाकी के सप्लाई का कोई हिसाब जलकल के पास नहीं है और इस बर्बाद जल को जलकल विभाग ने नान रेवेन्यु वाटर के आंकड़ों में डाल रखा है। यही नहीं यह बर्बादी प्रतिदिन होती है और इस बर्बाद जल के चलते ही जलकल की स्थिति यह है कि विकास और नए कार्य तो दूर कर्मचारियों को वेतन देना भी मुश्किल हो जाता है।
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शहर में पेयजल की बर्बादी में जलकल का भी रोल है, लेकिन जलकल भी क्या करे, आजादी से पहले की लाइनें भी आज तक बदली नहीं गई हैं। शहर में सप्लाई के लिए जो सबसे कम समय की पाइन लाइन है, वह भी कम से कम 30 साल पुरानी है और अपनी आयु को भी पार कर चुकी हैं। ऐसे में इन सभी पाइप लाइनों को बदलने की जरूरत है। ऐसा भी नहीं है कि शहर में पेयजल की लाइनों को बदलने और उनकी मरम्मत के लिए योजना नहीं बनी लेकिन ये सभी योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गईं।
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