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स्वर्ण जयंती के साक्षी बनेंगे दलाई लामा
Updated Fri, 29 Dec 2017 02:09 AM IST
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वाराणसी। बौद्ध धर्म की हृदयस्थली सारनाथ में स्थापित केंद्रीय तिब्बती अध्ययन संस्थान अपने 50 साल पूरे कर रहा है। संस्थान के इस स्वर्णिम इतिहास के साक्षी स्वयं तिब्बती धर्मगुरु परमपावन दलाई लामा होंगे, जिन्होंने 1967 में संस्थान की नींव भी रखी थी। उस समय संस्थान संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में एक संघटक विभाग के तौर पर शुरू हुआ था। अब यह मानद विश्वविद्यालय तक का सफर तय कर स्वर्ण जयंती मना रहा है।
दलाई लामा ने ही पांच दशक पहले संस्थान की परिकल्पना की थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू सरकार की मुहर लगते ही 1967 में इसे संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में एक विभाग के तौर पर साकार कर दिया गया। 1970 में सारनाथ में बतौर संस्थान इसे स्थापित किया गया। 1988 में इसे मानद विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। 2008 में इसका नाम बदलकर केंद्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय किया गया। 15 जनवरी 2009 में इसके नाम का लोकार्पण भी स्वयं दलाई लामा ने ही किया।
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दलाई लामा ने ही पांच दशक पहले संस्थान की परिकल्पना की थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू सरकार की मुहर लगते ही 1967 में इसे संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में एक विभाग के तौर पर साकार कर दिया गया। 1970 में सारनाथ में बतौर संस्थान इसे स्थापित किया गया। 1988 में इसे मानद विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। 2008 में इसका नाम बदलकर केंद्रीय तिब्बती अध्ययन विश्वविद्यालय किया गया। 15 जनवरी 2009 में इसके नाम का लोकार्पण भी स्वयं दलाई लामा ने ही किया।
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