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प्यालों पर लय-ताल के अनूठे अंदाज
Updated Sat, 11 Nov 2017 02:06 AM IST
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वाराणसी। चीनी मिट्टी के प्यालों पर बेंत की छड़ी के सहारे रागों की अवतारणा कितनी कठिन होगी, आप अंदाजा नहीं लगा सकते। लेकिन इन प्यालों पर आलाप भी बजता है, जोड़ भी। फिरकी की तरह नाचती स्टिक पर झाला की गूंज पर तो वक्त ठहर जाता है। प्यालों के स्वर और स्टिक के नाद के समन्वय का कोई जोड़ नहीं होता। इस वाद्य पर रागों की अवतारणा जब डॉ. राजेश्वर आचार्य करते हैं तो वह डूब जाते हैं। फिर साज और उनके बीच में कोई नहीं होता।
भदैनी स्थित आवास पर शुक्रवार को जल तरंग की साधना के कुछ यादगार लम्हें संजोए गए। दोपहर से ही आचार्य जी जल तरंग के प्याले मिलाने बैठ गए थे। शिष्यों ने प्याले सजाए। कभी उन प्यालों में जल भरा जाता रहा तो कभी मात्रा घटाई, बढ़ाई जाती रही। जल की मात्रा के साथ स्टिक से स्वरों का वो लगातार मिलान करते रहे। किसी प्याले में पानी कम होता और किसी में ज्यादा होने पर स्वरों के मिलान में कठिनाई का सामना भी करना पड़ रहा था। करीब तीन घंटे की मेहनत के बाद स्वर लगा तो उनके चेहरे पर चमक सी दौड़ गई। उन्होंने स्वरचित राग वाचस्पति की अवतारणा की। आलाप, जोड़ के बाद जब उन्होंने तीन ताल द्रुत लय में झाला बजाना शुरू किया तो स्वर, लय, ताल एकाकार हो गए। फिर उन्होंने दादरा ताल में एक धुन बजाई। वह बताते हैं कि इस वाद्य में पंचतत्वों का समन्वय होता है। उच्चताप पर पकाए गए प्यालों से ही स्वर निकलते हैं। इसलिए इसे बजाने के लिए साधक को तपना पड़ है।
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भदैनी स्थित आवास पर शुक्रवार को जल तरंग की साधना के कुछ यादगार लम्हें संजोए गए। दोपहर से ही आचार्य जी जल तरंग के प्याले मिलाने बैठ गए थे। शिष्यों ने प्याले सजाए। कभी उन प्यालों में जल भरा जाता रहा तो कभी मात्रा घटाई, बढ़ाई जाती रही। जल की मात्रा के साथ स्टिक से स्वरों का वो लगातार मिलान करते रहे। किसी प्याले में पानी कम होता और किसी में ज्यादा होने पर स्वरों के मिलान में कठिनाई का सामना भी करना पड़ रहा था। करीब तीन घंटे की मेहनत के बाद स्वर लगा तो उनके चेहरे पर चमक सी दौड़ गई। उन्होंने स्वरचित राग वाचस्पति की अवतारणा की। आलाप, जोड़ के बाद जब उन्होंने तीन ताल द्रुत लय में झाला बजाना शुरू किया तो स्वर, लय, ताल एकाकार हो गए। फिर उन्होंने दादरा ताल में एक धुन बजाई। वह बताते हैं कि इस वाद्य में पंचतत्वों का समन्वय होता है। उच्चताप पर पकाए गए प्यालों से ही स्वर निकलते हैं। इसलिए इसे बजाने के लिए साधक को तपना पड़ है।
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