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काशी विश्वनाथ मंदिर नहीं, सिर्फ प्रबंधन का स्थानांतरण
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वाराणसी। काशी विश्वनाथ मंदिर नहीं बल्कि मंदिर के प्रबंध तंत्र का स्थानांतरण हुआ है। यह जवाब सपा एमलएसी शतरूद्र प्रकाश द्वारा विधान परिषद में पूछे गए प्रश्नों के जवाब में धर्मार्थ कार्य मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी ने दिया है।
शतरूद्र ने पूछा था कि काशी विश्वनाथ मंदिर अधिनियम 1983 में क्या ज्योतिर्लिंग का अधिग्रहण किया गया है या फिर प्रबंध मात्र का स्थानांतरण हुआ है? इस पर मंत्री ने लिखित जवाब में कहा कि अधिनियम के तहत मात्र प्रबंधतंत्र को मंदिर और उसके विन्यास को शासन और प्रशासन न्यास परिषद में निहित किया गया है, जिसे काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास परिषद कहा गया है। अगले प्रश्न में एमएलसी ने पूछा कि मंदिर का स्वामित्व किसके पास है और मंदिर में आने वाले चल अचल संपत्तियों के दान, चढ़ावे या फिर लीज के रूप में प्राप्त होने वाली चीजें किसके नाम पर मंदिर के निधि में दर्ज होंगी, उसका स्वामी कौन होगा? इस पर मंत्री ने बताया कि अधिनियम 1983 की धारा 5 के अुनसार मंदिर व उसका विन्यास मंदिर के विग्रह में निहित है। इसलिए मंदिर प्रबंध द्वारा जितनी भी चल-अचल संपत्ति दान या चढ़ावे में मिलती है, वह धारा 23 (1) के तहत काशी विश्वनाथ मंदिर के निधि में जमा होती है।
एमएलसी ने अगले प्रश्न में पूछा कि अधिनियम के प्रभावी होने के बाद मंदिर प्रशासन द्वारा 23 फरवरी 2017 को सीके 37/40,41,42 को सन 1999 में रानी भवानी मंदिर और सन 2002 में तारकेश्वर मंदिर को किस नाम से क्रय किया गया है? जवाब मिला कि सीके 37/40,41,42 को मंदिर न्यास के नाम से मंदिर सीईओ द्वारा क्रय किया गया है। रानी भवानी मंदिर को राज्यपाल के मार्फत मंदिर सीईओ द्वारा मंदिर न्यास के पक्ष में खरीदा गया है और तारकेश्वर मंदिर को भी मंदिर सीईओ द्वारा न्यास के पक्ष में खरीदा गया है।
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शतरूद्र ने पूछा था कि काशी विश्वनाथ मंदिर अधिनियम 1983 में क्या ज्योतिर्लिंग का अधिग्रहण किया गया है या फिर प्रबंध मात्र का स्थानांतरण हुआ है? इस पर मंत्री ने लिखित जवाब में कहा कि अधिनियम के तहत मात्र प्रबंधतंत्र को मंदिर और उसके विन्यास को शासन और प्रशासन न्यास परिषद में निहित किया गया है, जिसे काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास परिषद कहा गया है। अगले प्रश्न में एमएलसी ने पूछा कि मंदिर का स्वामित्व किसके पास है और मंदिर में आने वाले चल अचल संपत्तियों के दान, चढ़ावे या फिर लीज के रूप में प्राप्त होने वाली चीजें किसके नाम पर मंदिर के निधि में दर्ज होंगी, उसका स्वामी कौन होगा? इस पर मंत्री ने बताया कि अधिनियम 1983 की धारा 5 के अुनसार मंदिर व उसका विन्यास मंदिर के विग्रह में निहित है। इसलिए मंदिर प्रबंध द्वारा जितनी भी चल-अचल संपत्ति दान या चढ़ावे में मिलती है, वह धारा 23 (1) के तहत काशी विश्वनाथ मंदिर के निधि में जमा होती है।
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एमएलसी ने अगले प्रश्न में पूछा कि अधिनियम के प्रभावी होने के बाद मंदिर प्रशासन द्वारा 23 फरवरी 2017 को सीके 37/40,41,42 को सन 1999 में रानी भवानी मंदिर और सन 2002 में तारकेश्वर मंदिर को किस नाम से क्रय किया गया है? जवाब मिला कि सीके 37/40,41,42 को मंदिर न्यास के नाम से मंदिर सीईओ द्वारा क्रय किया गया है। रानी भवानी मंदिर को राज्यपाल के मार्फत मंदिर सीईओ द्वारा मंदिर न्यास के पक्ष में खरीदा गया है और तारकेश्वर मंदिर को भी मंदिर सीईओ द्वारा न्यास के पक्ष में खरीदा गया है।
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