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हिंदी को लेकर हर तरह के संकोच को छोड़ना होगा
Updated Sun, 14 Jan 2018 02:37 AM IST
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वाराणसी। हिन्दी को पूरे देश की अस्मिता से जोड़ना होगा। हिंदी ने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण निभाई किंतु बदलते परिवेश में खासतौर से पत्रकारिता ने इसे बाजारू भाषा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। हिंदी को लेकर हमें हर तरह के संकोच को छोड़ना होगा। उक्त बातें वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने कहीं। वह शनिवार को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ, साहित्य अकादमी एवं विद्याश्री न्यास की ओर से धर्मसंघ में आयोजित हिंदी भाषा की परंपराएं प्रयोग और संभावनाएं विषयक संगोष्ठी व लेखक शिविर को संबोधित कर रहे थे।
डॉ. दिलीप सिंह ने भावात्मक एवं सांस्कृतिक एकता में हिंदी के योगदान और उपलब्धियों की व्याख्या की। तातियाना ने जर्मनी में हिंदी शिक्षण-प्रशिक्षण की चर्चा करते हुए कहा कि विदेशों में हिंदी के प्रति रुझान बढ़ रहा है। प्रो. सदानंद प्रसाद गुप्त ने हिंदी के प्रति हिंदीवालों की दृढ़ इच्छाशक्ति के अभाव पर क्षोभ व्यक्त किया। अजयेंद्रनाथ द्विवेदी, अखिलेश दूबे, करुणा पांडेय, रामप्रकाश कुशवाहा, प्रो. अवधेश प्रधान ने भी विचार रखे। अध्यक्षता प्रो. अनंत मिश्र ने की। उन्होंने हिंदी भाषा की शक्ति, स्थिति, स्वरूप और संभावनाओं पर फैले भ्रम का निराकरण किया। संचालन वशिष्ठ अनूप ने किया। इस दौरान प्रो. दिलीप सिंह की पुस्तक उजड़ेदारों का बेबाक अफसाना, कहां-कहां से गुजर गया और हिंदी साहित्य में सांस्कृतिक संवेदना और मूल्यबोध पुस्तक का भी लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम का संचालन विजेंद्र पांडेय ने किया।
काव्य गोष्ठी का हुआ आयोजन
वाराणसी। संगोष्ठी के समापन के दौरान हरिराम द्विवेदी की अध्यक्षता में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें आनंद परमानंद, नरोत्तम शिल्पी, कुंवर सिंह कुंवर, सिद्धिनाथ शर्मा, डॉ. पवन कुमार शास्त्री, डॉ. रामअवतार पांडेय, दीपक कुमार, करुणा सिंह, दीपंकर भट्टाचार्य, बिजेंद्र पांडेय, वशिष्ठ अनूप, शंभूनाथ श्रीवास्तव, अशोक सिंह घायल आदि ने काव्यपाठ किया। संचालन जितेंद्रनाथ मिश्र ने किया।
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डॉ. दिलीप सिंह ने भावात्मक एवं सांस्कृतिक एकता में हिंदी के योगदान और उपलब्धियों की व्याख्या की। तातियाना ने जर्मनी में हिंदी शिक्षण-प्रशिक्षण की चर्चा करते हुए कहा कि विदेशों में हिंदी के प्रति रुझान बढ़ रहा है। प्रो. सदानंद प्रसाद गुप्त ने हिंदी के प्रति हिंदीवालों की दृढ़ इच्छाशक्ति के अभाव पर क्षोभ व्यक्त किया। अजयेंद्रनाथ द्विवेदी, अखिलेश दूबे, करुणा पांडेय, रामप्रकाश कुशवाहा, प्रो. अवधेश प्रधान ने भी विचार रखे। अध्यक्षता प्रो. अनंत मिश्र ने की। उन्होंने हिंदी भाषा की शक्ति, स्थिति, स्वरूप और संभावनाओं पर फैले भ्रम का निराकरण किया। संचालन वशिष्ठ अनूप ने किया। इस दौरान प्रो. दिलीप सिंह की पुस्तक उजड़ेदारों का बेबाक अफसाना, कहां-कहां से गुजर गया और हिंदी साहित्य में सांस्कृतिक संवेदना और मूल्यबोध पुस्तक का भी लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम का संचालन विजेंद्र पांडेय ने किया।
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काव्य गोष्ठी का हुआ आयोजन
वाराणसी। संगोष्ठी के समापन के दौरान हरिराम द्विवेदी की अध्यक्षता में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें आनंद परमानंद, नरोत्तम शिल्पी, कुंवर सिंह कुंवर, सिद्धिनाथ शर्मा, डॉ. पवन कुमार शास्त्री, डॉ. रामअवतार पांडेय, दीपक कुमार, करुणा सिंह, दीपंकर भट्टाचार्य, बिजेंद्र पांडेय, वशिष्ठ अनूप, शंभूनाथ श्रीवास्तव, अशोक सिंह घायल आदि ने काव्यपाठ किया। संचालन जितेंद्रनाथ मिश्र ने किया।
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