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आज से शुरू होगा चार दिवसीय सूर्य उपासना का महापर्व

Varanasi Bureau Updated Sun, 11 Nov 2018 01:57 AM IST
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वाराणसी। सूर्य उपासना का चार दिवसीय महापर्व छठ रविवार से शुरू हो जाएगा। इस बार इस पूजा में दुर्लभ संयोग बन रहा है। इसलिए इस बार व्रत करने का एक अलग ही माहात्म्य है।
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ज्योतिषीय गणना के अनुसार यह घटना कार्तिक तथा चैत्र मास की अमावस्या के छह दिन उपरांत आती है। ज्योतिषीय गणना पर आधारित होने के कारण इसका नाम और कुछ नहीं, बल्कि छठ पर्व ही रखा गया है।
सूर्य षष्ठी व्रत वर्ष में दो बार होता है। एक चैत्र माह में और दूसरा कार्तिक माह में। इनमें कार्तिक मास के छठ पूजा का विशेष महत्व है। चार दिवसीय व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी की होती है। इसी कारण इस व्रत का नामकरण छठ व्रत हो गया। बीएचयू के ज्योतिष विभाग के प्रो. डॉ. सुभाष पांडेय ने बताया कि सूर्य के कारण ही बादल जल बरसाने में सक्षम होता है। सूर्य अनाज को पकाता है। इसलिए सूर्य का आभार व्यक्त करने के लिए प्राचीन काल से इस क्षेत्र के लोग सूर्य पूजा करते आ रहे हैं। वेदों में भी सूर्य को सबसे प्रमुख देवता के रूप में मान्यता प्राप्त है।
उन्होंने बताया कि कई वर्षों बाद छठ पर्व का प्रारंभ रविवार को होने और गुरु की धनु राशि में चंद्रमा और शनि की युति खास संयोग बना रही है। इस संयोग से लंबे समय से बीमार चल रहे व्यक्ति का स्वास्थ्य बेहतर होगा और नि:संतानों को संतान प्राप्ति का योग बनेगा। वहीं इस वर्ष छठ महापर्व पर शुक्र और सूर्य के एक साथ रहने से महालक्ष्मी की भी कृपा व्रतियों पर बरसेगी।
36 घंटे व्रत का चार दिवसीय कार्यक्रम
नहाय खाय रविवार 11 नवंबर
पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी नहाय खाय के रूप में मनाया जाता है। भोजन के रूप में कद्दू, दाल और चावल ग्रहण किया जाता है। यह दाल चने की होती है। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजनोपरांत ही भोजन ग्रहण करते हैं।
दूसरा दिन 12 नवंबर
दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे खरना कहा जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है।
सायं काल अर्घ्य 13 नवंबर
तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है। इसे ठेकुआ या टिकरी भी कहते हैं। इसके अलावा चावल के लड्डू बनाते हैं। इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया सांचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है। शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बांस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रती महिलाएं अस्ताचलगामी सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य देती हैं। सायंकालीन अर्घ्य का समय शाम 5.15 बजे है।
प्रात: अर्घ्य 14 नवंबर
चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदीयमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। व्रती वहीं पुन: नदी सरोवर और कुंड के किनारे इकट्ठा होती हैं। जहां उन्होंने शाम को अर्घ्य दिया था। पुन: पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। प्रात: कालीन अर्घ्य का समय प्रात: 6.30 बजे है।

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