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चेन्नई में विस्फोट से सहम गया यूपी!

Fri, 02 May 2014 11:16 AM IST
अजय राय/अमर उजाला, संजरपुर (आजमगढ़)
अजय राय/अमर उजाला, संजरपुर (आजमगढ़) Updated Fri, 02 May 2014 11:16 AM IST
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up village sanjarpur

चेन्नई में गुरुवार को विस्फोट हुआ। संजरपुर आशंकित हो गया। पता नहीं गांव के किस बच्चे का नाम इससे जुड़ जाए। इन्हीं आशंकाओं के बीच गांव के मर्द फूलपुर के डा. लोहिया पार्क में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को सुनने की तैयारियों में लगे थे। पिछले सात वर्षों से कथित आतंकी गांव का कलंक माथे पर लिए घूम रहे इस गांव के निवासियों की आस्था लोकतंत्र से एक इंच भी डिगी नहीं है।

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संजरपुर आतंकी गांव नहीं है। यहां के निवासियों ने बर्मा, मलेशिया, सिंगापुर, इंग्लैंड और अमेरिका में अपनी मेहनत के बल पर समृद्धि हासिल की। लोग बच्चों को पढ़ाते-लिखाते रहे हैं ताकि वे ठीक से पैरों पर खड़े हो सकें। यह बात बयां करते हुए शादाब अहमद उर्फ मिस्टर का दिल भर आता है। बटला हाउस कांड के आरोप में उनका एक बेटा सैफ जेल में हैं और दूसरा डा. शाहनवाज फरार है।
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आजमगढ़ जिले के नौ फरार बच्चों में चार संजरपुर के हैं और छह जेल बंद युवकों से तीन इस गांव के हैं। शादाब कहते हैं कि हमारे बच्चे मुल्जिम हैं, अभी मुजरिम तो नहीं हुए। नेता अपराधियों से खूब मिलते हैं लेकिन हमारे बच्चों से कोई मिलने जाए तो वह गुनाह माना जाता है, शक की निगाहों से देखा जाता है। अदालत तो बाद में सजा सुनाएगी और वह भी केवल दोषियों को लेकिन समाज ने तो पूरे गांव को ही सजा सुना दी। आज आजमगढ़ का होने मात्र से कोई हमसे किनारा करने लगता है।

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नहीं डिगा है लोकतंत्र में विश्वास

up village sanjarpur

मोहम्मद फैजल कहते हैं कि बटला हाउस कांड को लेकर राजनीति तो बहुत हुई लेकिन गेहूं के साथ पूरा गांव पिस रहा है किसी को इसकी फिक्र नहीं। आज बच्चे पासपोर्ट के लिए आवेदन करते हैं तो उसे शक की बिना पर खारिज कर दिया जाता है। बदनामी ने हमें शान से रोजी कमाने लायक नहीं छोड़ा। तकलीफ ने संजरपुर को जीने का नया सलीका सिखाया है। बाहरी दुनिया से रिश्ते बेहतर बनाने के लिए संजरपुर पीस कमेटी संचालित करने वाले तारीक शफीक कहते हैं कि मीडिया सहित सबने केवल पुलिस की सुनी और हमें सजा सुना दी। लोकतंत्र हमें कहने का हक देता है।

गांव के मसीउद्दीन संजरी कहते हैं कि हकीम तारीक की गिरफ्तारी 12 दिसंबर, 2007 को पास के गांव महमूदपुर से की गई थी और दिखाया गया था बाराबंकी से।

खालिद मुजाहिद के साथ भी ऐसा ही हुआ था। निमेष आयोग की रिपोर्ट से इसका सच सामने आ गया है। हमारा रिश्ता आसपास के समाज से खत्म हो गया होता लेकिन मानवाधिकार सम्मेलन आदि करके हमने खुद को संभाला है। हम लोकतंत्र में भरोसा करते हैं क्योंकि इससे बेहतर व्यवस्था दुनिया में अभी ईजाद नहीं हुई। गांव के लोग वोट डालने जाएंगे लेकिन दस हजार की आबादी वाले इस गांव के सभी 4500 वोट एक ही जगह जाएंगे, इसका दावा कोई नहीं कर सकता।

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