उत्तर प्रदेश चुनाव: क्या कांग्रेस का सपना पूरा कर पाएंगी पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी?
प्रियंका गांधी की राजनीति का अपना एक तरीका है। प्रियंका पिछले चार साल से उत्तर प्रदेश में मानवीय मूल्यों, लोगों की परेशानियों, उनकी पीड़ा से जुड़े मुद्दे को उठा रही हैं। इसी के इर्द-गिर्द वह बहुत सधे तरीके से सरकार और सत्ता को सहज राजनीतिक हमलों से घेर रही हैं। प्रियंका के राजनीतिक या सामाजिक अभियान राहुल गांधी के अभियानों से कहीं ज्यादा प्रभावी होते हैं। इसका एक बड़ा कारण उनका सहज संवाद भी है...
विस्तार
कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी की सक्रियता से कांग्रेस में नई ऊर्जा दिखाई देने लगी है। लखीमपुर से लेकर वाराणसी और लखनऊ तक प्रियंका के धुआंधार कार्यक्रमों और तीखे तेवर ने पार्टी में जान फूंकने की कोशिश के साथ ही प्रदेश में चुनावी माहौल भी गरमा दिया है। वाराणसी में बाबा विश्वनाथ के दर्शन से लेकर रैली के मंच तक प्रियंका के लिए बड़ी भीड़ उमड़ी तो लखनऊ में उनके मौन व्रत और सत्याग्रह ने अलग ही सियासी समां बांधा। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद राजेश मिश्रा कहते हैं कि बड़े दिन बाद पार्टी के लिए बनारस में उत्साह भरे दिन लौटे हैं। वहां से प्रियंका गांधी वाड्रा लखनऊ में मौन धारण करने गईं तो हर पल उत्तर प्रदेश सरकार का तापमान बढ़ने लगा। 12 अक्तूबर को वह लखीमपुर खीरी अरदास में शामिल हुईं। उनके साथ काफिले में चलने वाले सूत्र का कहना है कि अब तो वह पार्टी का चेहरा नहीं, ताकत हैं। यह तो साथ चलने पर दिखाई देता है।
उत्तर प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी को भी प्रियंका गांधी के राजनीतिक अभियान से काफी उम्मीदें हैं। यही हाल जौनपुर के कांग्रेस नेता सुरेन्द्र त्रिपाठी का है। सुरेन्द्र त्रिपाठी का कहना है कि प्रियंका के सलाहकारों में थोड़े व्यावहारिक लोगों को जगह मिल जाए तो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 में काफी कुछ बड़ा हो सकता है। प्रियंका के राजनीतिक अभियान में खुद पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ढाल बनकर आ जाते हैं। ऐसे में बड़ा सवाल है कि छह महीने दूर उत्तर प्रदेश के प्रस्तावित विधानसभा चुनाव में क्या प्रियंका गांधी अपनी पार्टी का सपना पूरा कर पाएंगी?
फोटो सेशन कराने आती हैं?
प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रियंका गांधी पर तंज कसते हैं। कहते हैं कि वे फोटो सेशन कराने आती हैं। यही बात वे राहुल गांधी के लिए भी कहते हैं। अब इसी कटाक्ष को समाजवादी पार्टी उसके सिपहसालारों में से एक संजय लाठर सरीखे नेता इस्तेमाल करने लगे हैं। बसपा प्रमुख मायावती के लिए प्रियंका गांधी या फिर राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में इससे अधिक कुछ नहीं कर सकते। मायावती के सचिवालय में मेवा लाल गौतम हैं। गौतम भी कहते हैं कि प्रियंका और राहुल का क्या? तीनों ही दलों (भाजपा, सपा, बसपा) के नेता दोनों नेताओं (राहुल-प्रियंका) के उत्तर प्रदेश में दौरे को राजनीतिक पिकनिक करार दे देते हैं। आज प्रधानमंत्री मोदी ने भी इशारे-इशारे में सवाल उठा दिया। उन्होंने बिना नाम लिए कहा कि कुछ लोग मानवाधिकार के नाम पर देश की छवि खराब करते हैं। ऐसे लोगों से सावधान रहना होगा। प्रधानमंत्री की देश की जनता को दी गई नसीहत के केंद्र में कहीं न कहीं राहुल और प्रियंका भी हैं। इस नसीहत में हाल में उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के तिकुनिया में हुई हिंसात्मक घटना से लेकर जम्मू-कश्मीर के हालात तक हैं।
कैसे खड़ी करेंगी विरोधियों की परेशानी
प्रियंका गांधी ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ाया है और कांग्रेस के नेता सहयोगियों को बढ़ा रहे हैं। प्रियंका गांधी की टीम के एक सदस्य की यह टिप्पणी भी अहम है। वह कहते हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस धीरे-धीरे स्टेक होल्डर बन रही है। चुनाव पूर्व होने वाले गठबंधन को देखते हुए अब कांग्रेस बढ़ती दिख रही है। बिना खुलकर बोले वह कहते हैं कि करीब आधा दर्जन छोटे दल कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के लिए तैयार हैं। फैसला अब कांग्रेस को ही लेना है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आचार्य प्रमोद कृष्णम प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल सिंह यादव के रथ पर सवार हो आए। इसे भी कांग्रेस का एक संदेश माना जा रहा है। हालांकि अभी यह तय होना बाकी है कि इन संदेशों में कितना दम है।
विरोधियों की आंख में किरकिरी की तरह क्यों चुभती हैं प्रियंका
प्रियंका गांधी की राजनीति का अपना एक तरीका है। उनके इस अभियान को मीडिया और प्रसार माध्यम भी जगह देते हैं। प्रियंका पिछले चार साल से उत्तर प्रदेश में मानवीय मूल्यों, लोगों की परेशानियों, उनकी पीड़ा से जुड़े मुद्दे को उठा रही हैं। इसी के इर्द-गिर्द वह बहुत सधे तरीके से सरकार और सत्ता को सहज राजनीतिक हमलों से घेर रही हैं। प्रियंका के राजनीतिक या सामाजिक अभियान राहुल गांधी के अभियानों से कहीं ज्यादा प्रभावी होते हैं। इसका एक बड़ा कारण उनका सहज संवाद भी है। चाहे भीम आर्मी के चंद्रशेखर रावण से मिलने की घटना रही हो या मेरठ में शहीद परिवार से मिलकर दु:ख दर्द साझा करने का मामला। हाथरस में दुष्कर्म पीड़िता के परिवार को ढांढस बधाने की घटना रही हो या फिर लखीमपुर खीरी में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को काले झंडे दिखाने निकले किसानों पर गाड़ी चढ़ाने का मामला, कांग्रेस महासचिव ने अपने तरीके से मोर्चा संभाला। वह पीडि़तों के न केवल परिवार से मिलीं बल्कि सरकार पर न्याय देने का दबाव भी बनाया। आगे की राजनीतिक लड़ाई भी लगातार लड़ रही हैं।
भीड़ तो आ जाती है, लेकिन वोट कहां है कांग्रेस के पास?
प्रियंका गांधी के हर अभियान में कांग्रेस के कार्यकर्ता सक्रिय दिखाई देते हैं। लोगों की भीड़ भी आ जाती है। समाजवादी पार्टी के एक नेता कहते हैं कि दर्शकों के सहारे पार्टियां चुनाव नहीं जीतते। मतदाता जरूरी हैं। बसपा के पुराने नेता सुधीर गोयल भी कहते हैं कि कांग्रेस का संगठन तो खत्म हो चुका है। उसे मजबूत करने के कांग्रेस ने कई अवसर गंवा दिए। अब तो ढूंढना भी मुश्किल है कि कांग्रेस का मूल वोटर और कैडर कहां है? बनारस से दुष्यंत राय भी कांग्रेस पर इसी तरह का तंज कसते हैं। प्रशांत किशोर ने भी हाल में लखीमपुर खीरी प्रकरण से उम्मीद लगाए बैठी कांग्रेस को इससे बहुत उम्मीद न पालने की सलाह दे डाली। वहीं पुराने कांग्रेसी नेता केएन पाठक कहते हैं कि राजनीति में विकल्प पैदा होते और जनता को नया नेता चुनते देर नहीं लगती। वह कहते हैं कि जनता ही नेता बनाती है। नेता जनता को नहीं बना सकता। इसके लिए वह दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और प्रधानमंत्री मोदी को याद करते हैं। पाठक कहते हैं कि कभी अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी की भाजपा थी। मोदी को उन्हीं के राज्यों के नेता प्रचार के लिए नहीं बुलाते थे। आज हालात एकदम उल्टे हैं। विधानसभा चुनाव 2017 में कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में 6.25 फीसदी वोट मिले थे। जबकि 2012 के विधानसभा चुनाव में 11.6 फीसदी वोट मिले थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में 7.5 फीसदी वोट मिला था। लोकसभा चुनाव में परंपरागत सीट अमेठी हार गई। हालांकि 11 सीटों पर 2019 में हुए उपचुनाव में उसे 12.5 प्रतिशत वोट मिले थे।
...लेकिन इस बार देखिएगा
कांग्रेस के नेता कहते हैं कि इस बार देखिएगा। अभी चुनाव होने में चार-पांच महीने बचे हैं। उत्तर प्रदेश से सटे उत्तराखंड में बड़े नेताओं का कांग्रेस में लौटना शुरू हो गया है। बताते हैं मध्यप्रदेश में कांग्रेस की स्थिति मजबूत हो रही है। उत्तर प्रदेश से सटे बिहार में भी कांग्रेस के नेता अच्छा कर रहे हैं। अमेठी में राजीव गांधी और संजय गांधी का चुनाव प्रचार कर चुके प्रदीप कुमार कहते हैं कि अब तो कहीं भी किसी के साथ बड़ा अन्याय हो जाए तो लोग चाहते हैं कि प्रियंका गांधी उनकी आवाज उठाएं। क्योंकि प्रियंका के वहां पहुंचने की खबर सुनकर ही प्रदेश सरकार परेशान हो जाती है। मुख्यमंत्री खुद ट्वीट करने लगते हैं। शिवेंद्र राय का कहना है कि विधानसभा चुनाव 2022 में आपको कांग्रेस दिखाई देगी। उसका वोट भी बढ़ता हुआ दिखेगा। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू भी इसे लेकर उत्साहित हैं। सभी के पास केवल एक आधार है। सभी को लग रहा है कि प्रदेश की जनता से प्रियंका गांधी वोट मांगेगी और वह कांग्रेस के पक्ष में मतदान करेंगी।