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UP Election 2022: माया मिली न राम...अपने ही जाल में उलझती गई कांग्रेस

Mon, 22 Nov 2021 04:35 PM IST
विक्रांत चतुर्वेदी चुनाव डेस्क, लखनऊ 
चुनाव डेस्क, लखनऊ  Published by: विक्रांत चतुर्वेदी Updated Mon, 22 Nov 2021 04:35 PM IST
सार

कभी हिंदुओं तो कभी मुसलमानों को साधने में पेंडुलम बन गई पार्टी।
 

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UP Election 2022: Congress party was confused in trying to balance Hindus and Muslims
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी। - फोटो : amar ujala

विस्तार

1969 में राष्ट्रपति चुनाव में पार्टी में ही खेमेबंदी की शिकार हुई कांग्रेस 1984 के बाद प्रदेश में कभी हिंदुओं तो कभी मुसलमानों को साधने के चक्कर में ऐसी चकरघिन्नी हुई कि राजनीतिक अखाड़े में चारों खाने चित हो गई। रही-सही कसर पूरी कर दी कांग्रेस नेतृत्व के असमंजस, अनिर्णय, परिवारवाद, तदर्थवाद के साथ ही विश्वनाथ प्रताप सिंह, आरिफ  मोहम्मद खान और अरुण नेहरू की बगावत ने।

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लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. एसके द्विवेदी बताते हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा की पहल पर 1969 में कांग्रेस पार्टी ने ‘समाजवादी आर्थिक नीतियों’ की घोषणा की। निजलिंगप्पा, मोरारजी देसाई, अतुल्य घोष और एसके पाटिल ने इसका विरोध किया। इंदिरा ने विरोधियों को अपनी ताकत का एहसास कराने के लिए बैंकों के राष्ट्रीयकरण की घोषणा कर दी। राष्ट्रपति चुनाव की हलचल के बीच इन फैसलों ने कांग्रेस में मतभेद गहरे कर दिए। 
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इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति चुनाव में पहले नीलम संजीव रेड्डी को कांग्रेस से उम्मीदवार बनाया, लेकिन बाद में उन्हें लगा कि रेड्डी राष्ट्रपति हो गए तो विरोधी खेमा मजबूत हो जाएगा। लिहाजा उन्होंने पलटी मारी और वीवी गिरि को अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने का आह्वान कर दिया। वस्तुत: पार्टी कभी हिंदुओं तो कभी मुसलमानों को साधने में पेंडुलम बन गई और तय नहीं कर पा रही थी कि किधर जाएं।
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‘अंतरात्मा की आवाज’ बनी बिखराव की आवाज
वरिष्ठ पत्रकार कमल नयन के संस्मरण से पता चलता है कि राष्ट्रपति के चुनाव के वक्त चंद्रभानु गुप्त प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और कमलापति त्रिपाठी उप मुख्यमंत्री। चुनाव का फैसला उत्तर प्रदेश की भूमिका पर टिका था। मुख्यमंत्री चंद्रभानु गुप्ता रेड्डी के पक्ष में पूरी ताकत से जुटे थे। सारी निगाहें उपमुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी पर थीं। मतदान वाले दिन सुबह कमलापति ने अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने की घोषणा कर हलचल मचा दी। गिरि जीत गए। इंदिरा गांधी ने तो कांग्रेस पर अपना वर्चस्व साबित कर दिया, पर, इसी के साथ कांग्रेस के बिखराव और उसके पराभव के बीज भी बो दिए गए।

असमंजस, गलत फैसले और गुटबाजी ले डूबी
मुलायम सिंह यादव, विश्वनाथ प्रताप सिंह और राजीव गांधी तीनों उत्तर प्रदेश से थे। मंदिर आंदोलन के सहारे हिंदुत्व की सियासी ताकत जुटाने की रणनीति का केंद्र भी उत्तर प्रदेश था। लिहाजा देश में बोफोर्स तोप घोटाले के चलते भ्रष्टाचार बनाम ईमानदारी, सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता का केंद्र भी यूपी बन गया। वहीं, 1980 के बाद प्रदेश में वीपी सिंह, श्रीपति मिश्र फिर 1985 में पहले नारायण दत्त तिवारी, फिर वीर बहादुर सिंह और उसके बाद फिर नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री बनाने के प्रयोग, संगठन में तदर्थवाद को बढ़ावा और शाहबानो से लेकर मंदिर के मुद्दे तक उसकी असमंजसपूर्ण भूमिका ने प्रदेश कांग्रेस में जबर्दस्त गुटबाजी पैदा कर दी थी। इन सबमें कांग्रेस संभल नहीं पाई।

करें या न करें में गुजर गया कारवां
संघ परिवार हिंदुत्व का कार्ड खेलकर जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहा था तो वीपी सिंह मंडल आयोग के जरिये पिछड़ों को लुभाने मे जुटे थे। मुलायम की निगाहें नए सियासी जातीय समीकरण के सहारे पिछड़ों, खासतौर से प्रदेश में पिछड़ों में 20 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाले यादवों के साथ ही 18 प्रतिशत मुस्लिम वोटों पर थी। कांग्रेस तय नहीं कर पा रही थी कि उसे क्या करना चाहिए। तभी कारसेवा आंदोलन और उसमें चली गोलियों से हुई मौतों ने प्रदेश में हिंदुओं के ध्रुवीकरण की राजनीति को और हवा दे दी। भाजपा ने प्रदेश में मुलायम और केंद्र में वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया। असमंजस में उलझी कांग्रेस ने एक बार फिर गलत चाल चली। उसने प्रदेश में उस मुलायम सिंह सरकार के समर्थन की घोषणा कर दी जो उनकी ही केंद्र सरकार पर भ्रष्टाचार और सांप्रदायिक राजनीति को प्रश्रय देने का आरोप लगाकर सत्ता में आई थी।


बसपा को ज्यादा सीटें देने का गया गलत संदेश
कांशीराम और मायावती की सक्रियता ने प्रदेश के अनुसूचित जाति के वोटों को भी कांग्रेस से दूर करना शुरू कर दिया। कांग्रेस ने अपनी ताकत बढ़ाने के उपाय के बजाय दूसरे के कंधे के सहारे आगे बढ़ने का रास्ता चुना। वर्ष 1996 में कांग्रेस ने बसपा से गठबंधन किया। सबसे पुरानी व बड़ी पार्टी कहलाने वाली कांग्रेस ने प्रदेश में सिर्फ 126 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया जबकि बसपा ने समझौते में 296 सीटें ले लीं। इससे कांग्रेस ने खुद अपने कमजोर होने और दूसरे के सहारे बिना प्रदेश में कुछ न कर पाने का संदेश दे दिया। जिन सीटों पर कांग्रेस नहीं लड़ी वहां के नेताओं ने दूसरे दलों में जगह तलाशनी शुरू कर दी, क्योंकि उन्हें यह संदेश चला गया कि कांग्रेस अब किसी न किसी पार्टी के पीछे ही चलेगी।

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