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सड़कों पर बम-बम भोले के जयकारों की गूंज
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गंगा जल लेकर लोधेश्वर मंदिर जाते कावड़ियों के जत्थे।
- फोटो : UNNAO
उन्नाव। आदिदेव महादेव की पूजा-अर्चना का पर्व महाशिवरात्रि नजदीक आते ही लोधेश्वर जाने वाले कांवड़ियों की संख्या बढ़ती जा रही है।
विभिन्न जिलों के लोग यहां अलग-अलग गंगा घाटों से भोलेनाथ का जलाभिषेक करने को गंगाजल भरने के बाद यात्रा की शुरुआत करते हैं। शनिवार फाल्गुन मास की अष्टमी चार मार्च से लोधेश्वर मंदिर में जलाभिषेक शुरू हो जाएगा। हालांकि बड़ी संख्या में शिवभक्त 11 मार्च को शिवरात्रि पर ही जलाभिषेक कर वापसी करेंगे।
लोधेश्वर जाने वाले कानपुर महानगर, देहात, औरैया, इटावा, जलौन, बांदा व फतेहपुर जिलों के शिवभक्त अपने घरों से चलकर अलग-अलग रास्तों से यहां परियर, शुक्लागंज, जाजमऊ व बक्सर स्थित गंगा घाट पहुंचते हैं। यहां गंगा में आस्था की डुबकी लगाने के बाद वह साथ लाए पात्रों में गंगाजल भरने के बाद यात्रा की शुरुआत करते हैं।
लोधेश्वर महादेव के जलाभिषेक के लिए गंगाजल लेने के बाद ही असल कांवड़ यात्रा शुरू मानी जाती है। इसके बाद खड्डी कांवड़ लेकर चलने वाले अपनी कांवड़ जमीन पर नहीं रखते हैं। इसलिए काफिले में दो से तीन गुना अधिक भक्तों को शामिल किया जाता है।
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साथ चलने वाले अतिरिक्त लोग बारी-बारी से कांवड़ को कंधे पर रखकर न सिर्फ गंतव्य की ओर बढ़ते है, बल्कि कहीं विश्राम किए जाते समय भी कांवड़ को कंधे पर रखकर खड़े रहते हैं। इसके विपरीत बैकुंठी कांवड़ ले जाने वाले इसे कहीं रखकर विश्राम कर सकते हैं। फाल्गुनी कांवड़ यात्रा में शामिल यात्री रास्ते भर शिवभक्ति के गीत गाते हैं।
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विभिन्न जिलों के लोग यहां अलग-अलग गंगा घाटों से भोलेनाथ का जलाभिषेक करने को गंगाजल भरने के बाद यात्रा की शुरुआत करते हैं। शनिवार फाल्गुन मास की अष्टमी चार मार्च से लोधेश्वर मंदिर में जलाभिषेक शुरू हो जाएगा। हालांकि बड़ी संख्या में शिवभक्त 11 मार्च को शिवरात्रि पर ही जलाभिषेक कर वापसी करेंगे।
लोधेश्वर जाने वाले कानपुर महानगर, देहात, औरैया, इटावा, जलौन, बांदा व फतेहपुर जिलों के शिवभक्त अपने घरों से चलकर अलग-अलग रास्तों से यहां परियर, शुक्लागंज, जाजमऊ व बक्सर स्थित गंगा घाट पहुंचते हैं। यहां गंगा में आस्था की डुबकी लगाने के बाद वह साथ लाए पात्रों में गंगाजल भरने के बाद यात्रा की शुरुआत करते हैं।
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लोधेश्वर महादेव के जलाभिषेक के लिए गंगाजल लेने के बाद ही असल कांवड़ यात्रा शुरू मानी जाती है। इसके बाद खड्डी कांवड़ लेकर चलने वाले अपनी कांवड़ जमीन पर नहीं रखते हैं। इसलिए काफिले में दो से तीन गुना अधिक भक्तों को शामिल किया जाता है।
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साथ चलने वाले अतिरिक्त लोग बारी-बारी से कांवड़ को कंधे पर रखकर न सिर्फ गंतव्य की ओर बढ़ते है, बल्कि कहीं विश्राम किए जाते समय भी कांवड़ को कंधे पर रखकर खड़े रहते हैं। इसके विपरीत बैकुंठी कांवड़ ले जाने वाले इसे कहीं रखकर विश्राम कर सकते हैं। फाल्गुनी कांवड़ यात्रा में शामिल यात्री रास्ते भर शिवभक्ति के गीत गाते हैं।