गिरा मंडी समिति का व्यापार, सकते में किसान
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रोजाना 10 लाख का टर्नओवर करने वाली उन्नाव मंडी समिति का कारोबार चार लाख में सिमट गया है। किसानों और व्यापारियों को ही नहीं मंडी समिति को भी लाखों के टैक्स का नुकसान हो चुका है। कानपुर-लखनऊ नेशनल हाईवे पर रेलवे ओवरब्रिज (आरओबी) के पास स्थित नवीन मंडी स्थल में व्यापार की धमक नोट की चोट से दम तोड़ रही है। पुरानी करेंसी बंद होने के साथ ही बैंकों में नई करेंसी की कमी से आम लोग ही नहीं व्यापारी भी हलाकान है। 1000 व 500 सौ के नोटों की पाबंदी के बाद से मंडी समिति को शुक्रवार 18 वें दिन तक 4 लाख से अधिक के टैक्स का नुकसान हो चुका है। तो वहीं व्यापारी वर्ग का टर्न ओवर भी तीस फीसदी तक सीमित रह गया है। इससे व्यापारियों में अफरा तफरी का माहौल बन गया है। व्यापार की चाल थमने के अलावा हरी सब्जी व फल की बर्बादी से थोक व्यापारियों को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। जिस मंडी समिति में रोजाना दस लाख से अधिक का व्यापार हो रहा था। उसका मीटर अब तीन से चार लाख के बीच पर ही जाकर टिक जा रहा। सबसे ज्यादा परेशान किसान है। जिसे फसल की लागत का चौथा हिस्सा भी नोट बंदी के कहर के चलते नहीं मिल पा रहा है।
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सड़ रहे फल, औने पौने दामों में बिक रही हरी सब्जी
उन्नाव। नोट की मार से नवीन मंडी आने वाला किसान तो परेशान है ही। व्यापारी वर्ग भी कहीं ज्यादा मुसीबतों में फंसा है। किसान को उसकी फसल की लागत नहीं वसूल हो रही तो व्यापारियों का स्टाक माल सड़ रहा है। शुक्रवार को व्यापारियों व किसानों ने बातचीत में बड़े नोट की पाबंदी के बाद का हाल बयंा करते समय आंखों से आंसू न रोक सके। किसानों की जुबां पर बस एक ही बात थी कि कभी प्रकृति, तो कभी सिस्टम तो अब पांच सौ व हजार के नोट ने कहीं का नहीं छोड़ा है। मुनाफा तो दूर ट्रैक्टर की जुताई का पैसा निकलना भी मुश्किल दिख रहा है।
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मंडी समिति को पचास फीसद का नुकसान
उन्नाव। नोट बंदी की मार से राज्य सरकार का खजाना भी प्रभावित हो रहा है। मंडी समिति प्रभारी निरीक्षक नागेंद्र सिंह चंदेल ने बताया कि वैसे तो हर महीने ढाई फीसदी के हिसाब से लगभग दस लाख का टैक्स मंडी समिति में जमा होता है। नोटबंदी के फैसले के बाद से बीते 18 दिनों में साढ़े तीन लाख से भी कम का टैक्स जमा हुआ है।