{"_id":"26d036fa-e80b-11e2-8462-d4ae52bc57c2","slug":"two-face-of-bjp-in-up","type":"story","status":"publish","title_hn":"यूपी: हिंदुत्व या विकास, क्यों दिखा रही भाजपा दो चेहरे?","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
यूपी: हिंदुत्व या विकास, क्यों दिखा रही भाजपा दो चेहरे?
अखिलेश वाजपेयी
Updated Tue, 09 Jul 2013 10:38 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी एक मौलाना की जेब से निकली टोपी को हाथ जोड़कर पहनने से मना कर देते हैं। देश भर में इसकी चर्चा होती है और मोदी हिंदुत्व के प्रतीक पुरुष बन जाते हैं।
विज्ञापन
कार्यकर्ता ही नहीं बल्कि पार्टी के बड़े नेताओं का भी एक खेमा व संघ के नीति नियंता मोदी के सहारे देश भर में हिंदुत्व का ज्वार पैदा कर दिल्ली की सत्ता हासिल होने का सपना देखने लगते हैं।
विज्ञापन
पर, उन्हीं मोदी की मौजूदगी में जब चुनावी अभियान समिति की बैठक से यह फैसला बाहर आता है कि भाजपा मुसलमानों के मन साफ करने के लिए देश भर में अभियान चलाएगी। उन्हें बताएगी, ‘भाजपा आपकी दुश्मन नहीं है।’
विज्ञापन
पर, इन्हीं मोदी के करीबी प्रदेश प्रभारी अमित शाह दो दिन बाद जब अयोध्या पहुंचते हैं और ‘श्रीराम जन्मभूमि स्थल’ पर भव्य मंदिर निर्माण की घोषणा करते हैं। इसके लिए कांग्रेस का खात्मा जरूरी बताते हैं।
मंदिर निर्माण को भाजपा के एजेंडे में बताते हैं। वह कार्यकर्ताओं को यह उलाहना भी दे डालते हैं, ‘आप जयश्रीराम व हम हिंदू हैं, कहने में क्यों हिचकते हैं?’ उनके भगवा तेवर गोरखपुर तक बरकरार दिखते हैं।
पर, शाह जिस समय गोरखपुर में भगवा तेवर को धार दे रहे होते हैं, उसी दिन पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह का यह बयान सामने आता है कि मंदिर भाजपा के एजेंडे में नहीं है। शाह पार्टी के प्रवक्ता नहीं है। इसलिए उनकी बात पार्टी की अधिकृत राय नहीं है। भाजपा हिंदुत्व के एजेंडे पर नहीं बल्कि विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ेगी। तो चर्चा शुरू हो जाती है कि पार्टी असमंजस और खींचतान में उलझ गई है। देखने में लगता भी यही है।
असमंजस नहीं रणनीति
भाजपा नेताओं की इन गड्मड्ड बातों को लोग असमंजस मान रहे हैं। कोई इसे पार्टी नेताओं के बीच खींचतान भी करार दे रहा है तो कोई राजनाथ सिंह के बयान को अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चलाना मानकर प्रतिक्रिया दे रहा है। पर, लंबे अरसे पार्टी की नीति व रणनीति को देखने व समझने वालों की मानें तो न यह नेताओं की खींचतान है और न उनके रणनीतिकारों का असमंजस। यह सब उनकी सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है।
पार्टी नेता जानबूझकर इस तरह की स्थिति को निर्माण कर रहे हैं जो विरोधियों को उलझाकर रख दे। इनकी बात सही भी लगती है क्योंकि 1999 के लोकसभा चुनाव और 2007 के विधानसभा चुनाव को छोड़ दें तो जन्मभूमि स्थल पर भव्य मंदिर निर्माण की प्रतिबद्धता भाजपा के घोषणापत्र का हमेशा हिस्सा रही है।
पार्टी के नेता न सिर्फ बातों में बल्कि लिखापढ़ी में यह कहते आए हैं कि अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर ऐतिहासिक तथ्य है। इसलिए यह मान लेना कि भाजपा हिंदुत्व या राममंदिर को छोड़कर सिर्फ विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ेगी, भूल होगी।
यह तो फीडबैक लेने का हिस्सा है
पार्टी के रणनीतिकारों में लंबे समय तक शामिल रहे एक नेता कहते हैं कि यह पहली बार नहीं हो रहा है। हमारे यहां दो धाराएं हमेशा रही हैं। जिन्हें भाजपा विरोधी दल उदारवादी और कट्टरवादी नाम देते रहे हैं। लंबे समय तक अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी इन्हीं दो धाराओं का प्रतिनिधि माने जाते रहे हैं।
पर, वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल कहते हैं भाजपा के रणनीतिकार विभिन्न मुद्दों का तापमान नापना चाहते हैं। उनकी कोशिश यह फीडबैक लेने की है कि अयोध्या में श्री जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण और हिंदुत्व का मुद्दा अब भी वोट दिला सकता है या नहीं।
रही बात राजनाथ सिंह की तो वह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। वह तब तक कोई साफ बात नहीं करेंगे जब तक कि उस पर निर्णय न हो जाए। वह कहते हैं कि किसी भी पार्टी की अधिकृत दस्तावेज उसका घोषणा पत्र होता है।
शाह हों या कल्याण सिंह अथवा वरुण गांधी, उमाभारती, योगी आदित्यनाथ अथवा संघ परिवार का अन्य कोई संगठन व नेता, ये सभी अलग-अलग मुद्दों पर और अलग-अलग तरह लोगों के मन व मूड की थाह ले लेना चाहते हैं।
जिस लाइन से फायदा होते दिखेगा, वह पार्टी के घोषणा पत्र में शामिल हो जाएगी।