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उत्तराखंड त्रासदी: जिंदा रहने के लिए लोग खा रहे हैं घास
अजय झंवर
Updated Fri, 21 Jun 2013 11:00 AM IST
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देवभूमि हिमालयन सुनामी से बचकर लौट रहे लोगों की रूह उस भयावह मंजर की कल्पना से ही कांप जाती हैं। प्रकृति के इस कहर से जो लोग बच गए वह अपनी जिंदगी को ईश्वर की कृपा मान रहे हैं। प्राकृतिक आपदा में फंसे लोगों के प्रति उत्तराखंड प्रशासन का रवैया भी संवेदनहीन रहा।
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बचाव के लिए केदारनाथ पहुंचे हेलीकाप्टर से सबसे पहले वहां मौजूद एडीएम और पुलिस अफसर, यात्रियों को उनके हाल पर छोड़कर भागे। हजारों लोग अभी भी पहाड़ों पर फंसे हैं और घास खाकर जिंदा है। खुद हर पल मौत से सामना कर लौटे लोग भी पहाड़ पर फंसी हजारों जिंदगी को बचाने की अपील कर रहे हैं।
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कासगंज के चिकित्सक सुभाष अग्रवाल और अपने परिवार के साथ केदारनाथ गए थे। वह रास्ते में सतपड़ा रामनगर में फंस गए थे। गुरुवार को रास्ता साफ होने के बाद वह कासगंज के लिए चल दिए है।
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उनके साथ केदारनाथ से बचकर आए शामली के गांव दरगापुर के रहने वाले अमित सरोहा अपने ममेरे भाई रोहित और पंकज केदारनाथ में फंस गए थे और उन्होंने तबाही के इस मंजर को देखा।
उन्होंने मोबाइल पर हुई बातचीत में बताया कि शाम को करीब साढ़े छह बजे जबरदस्त पानी आया और अपने साथ सब कुछ बहाता ले गया। मंदिर की सीढ़ियां और कुछ हिस्सा बह गया। हजारों तीर्थयात्री, मकान, दुकान, गाड़ी बह गए। जैसे-तैसे रविवार की रात जागकर कटी। ऊंची पहाड़ी पर चढ़कर हजारों लोगों ने अपनी जान बचाई लेकिन सोमवार की सुबह सात बजे फिर से पानी का सैलाब आया और तबाही मचा गया।
उन्होंने बताया कि मदद काफी धीमी गति से मिल रही है। जिंदा रहने के लिए लोग घास खा रहे हैं। वह खुद रविवार से भूखे है। ऊंचे पहाड़ों पर करीब दो हजार यात्री फंसे है लेकिन अभी सिर्फ पांच सौ लोग ही हेलीकाप्टर से नीचे आ सके हैं। उनका मानना है कि कम से कम करीब दस हजार यात्री इस केदारनाथ के जलजले में बहे हैं। रामबाढ़, हनुमान चट्टी, गौरीकुंड सब कुछ प्लेन हो चुका हैं।
अमित सरोहा ने बताया कि बताया कि उन्हें हैरत उस समय हुई कि जब केदारनाथ में मौजूद एसडीएम व पुलिस के अधिकारी पहला राहत का हेलीकाप्टर पहुंचते ही उसमें सवार होकर खुद निकल आए। मंगलवार को हेलीकाप्टर से आने के बाद उन्हें खाना मिला है।
उन्होंने बताया कि राहत कैंप पर कोई मेडिकल सुविधा नहीं है। अमित सरोहा ने बताया कि हेलीकाप्टर से आने वाले यात्रियों को कहीं भी उतार दिया जाता हैं। उन्होंने शासन और प्रशासन से अपील की अभी पहाड़ों पर फंसी हजारों जानों को जल्दी से बचाओ, कहीं फिर तबाही न आ जाए।