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...तो बौद्ध गया और सारनाथ जैसा होता ‘गढ़ा’ 

Sun, 16 Apr 2017 10:27 PM IST
Amarujala
Amarujala Updated Sun, 16 Apr 2017 10:27 PM IST
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Nobody cares about Historical place Garha
उपेक्षित पड़े पौराणिक स्‍थल - फोटो : अमर उजाला

सरकार की नजर-ए-इनायत होती तो बौद्धकालीन इतिहास को खुद में समेटे ‘गढ़ा’ के दिन बहुर सकते थे। देश-विदेश के पर्यटन स्थल के नक्शे में इसकी मौजूदगी ही नहीं होती बल्कि विदेशी मुद्रा अर्जित करने का यह बड़ा जरिया भी होता। गढ़ा को पर्यटन स्थल बनाने के लिए समय-समय पर सियासतदां ने  बड़े-बड़े दावे किए लेकिन उसे अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका। 

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ऐतिहासिक कुड़वार का किला जिसे ‘गढ़ा’ के नाम से जाना जाता है, ग्रेंट कुड़वार के पश्चिम गोमती नदी के किनारे स्थित है। इतिहासकारों के मुताबिक कलाम वंशीय  क्षत्रियों ने कुड़वा नामक स्टेट इसी स्थान पर बनवाई थी। समय गुजरने के साथ  यह स्थल कुड़वार के नाम से जाना जाने लगा।
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बौद्ध ग्रंथों में भी गढ़ा का उल्लेख मिलता है। उसके मुताबिक महात्मा बुद्ध ने कुछ दिनों तक यहां रुककर बौद्ध भिक्षुओं को दीक्षा दी थी। इतिहासकारों के अनुसार चीनी यात्री  ह्वेनसांग 636 ई. में कन्नौज से प्रयाग आया था। प्रयाग से गंगा पार कर वह उत्तर दिशा में आगे बढ़ा तब उसने काशेपुला नाम का शहर देखा। शहर में भव्य  स्तूप था, जो अत्यंत समृद्ध था। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि ह्वेनसांग  ने इसी स्थल को देखा था।
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सुल्तानपुर गजेटिर में भी गढ़ा का उल्लेख मिलता  है। उम्र के अंतिम पड़ाव पर पहुंच रहे क्षेत्र के धर्मदत्त मिश्र व शिवशंकर  सिंह बताते हैं कि उनकी समझ में मुक्तानंद ने यहां एक बौद्ध सम्मेलन कराया  था। सम्मेलन में चीन, जापान, थाईलैंड समेत देश-विदेश के बौद्ध भिक्षुओं ने  हिस्सा लिया था। बाद में पुरातत्व विभाग ने इस स्थल पर खुदाई भी करवाई।  खुदाई में भगवान बुद्ध की मूर्तियां व स्तूप के भग्नावशेष मिले। गढ़ा के  इर्द-गिर्द छिटकी लाखौरी ईंटों की दीवारें इमारत की बुलंदी की कहानी बयां करती हैं। इतने सारे ऐतिहासिक व पुरातात्विक प्रमाणों के बावजूद यह स्थल उपेक्षा का शिकार हैं। सरकार की उदासीनता से गढ़ा का खंडहर जंगल में तरमीम  हो चुका है। यहां पहुंचने के लिए पगडंडियों का ही एकमात्र सहारा है। 

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