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गायत्री ने अमेठी में सुखाईं सपा की जड़ें

Mon, 12 Sep 2016 10:42 PM IST
Amar ujala Bureau
Amar ujala Bureau Updated Mon, 12 Sep 2016 10:42 PM IST
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Gayatri damaged Parties repute in Amethi
गायत्री को फायदा लेकिन पार्टी को नुकसान - फोटो : अमर उजाला

गायत्री प्रसाद प्रजापति की मंत्री पद से बर्खास्तगी का असर अमेठी की सियासत पर पड़ना तय माना जा रहा है। मंत्री बनने के बाद उन्होंने अमेठी की समाजवादी पार्टी में अपनी छवि बरगद जैसी बनाई जिसके नीचे बिरवा पनप तो सकता है लेकिन पेड़ का रूप कभी अख्यितार नहीं कर सकता।

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नतीजा यह है कि सपा में जो नेता यहां पहले से स्थापित थे वे गायत्री के पिछलग्गू बन गए। गायत्री मजबूत होते गए और पार्टी कमजोर होती गई। अन्य दलों के कद्दावर नेता भी साढ़े चार साल तक उनके मुकाबले बेबस नजर आए। अब उनकी बर्खास्तगी का लाभ कमोबेश सभी विपक्षी दलों को मिलेगा।
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अमेठी विधानसभा सीट से तीन बार शिकस्त का मुंह देख चुके गायत्री प्रसाद प्रजापति के लिए 2012 का चुनाव राजनीति का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। उन्होंने अमेठी विधानसभा सीट पर कांग्रेस की कद्दावर नेताओं में शुमार अमीता सिंह को चुनाव में शिकस्त देकर सियासी हलके में सनसनी फैला दी। अमीता सिंह की पराजय को राहुल गांधी से लेकर डॉ. संजय सिंह की शिकस्त के रूप में देखा गया। समाजवादी पार्टी ने गायत्री प्रसाद प्रजापति को इसका इनाम मंत्री बनाकर दिया।
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मंत्री बनने के बाद गायत्री प्रसाद प्रजापति ने न केवल अपने दल के स्थापित नेताओं को किनारे लगाया बल्कि राहुल गांधी से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक को समय-समय निशाने पर लेकर यह दिखाने की कोशिश की, कि वे सपा की पहली कतार के नेताओं में शुमार हैं। इसके पहले अमेठी से समाजवादी पार्टी के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ चुके रमाशंकर सिंह रहे हों या फिर उम्मीदवारी का दावा कर चुके अमरेंद्र सिंह पिंटू, मंत्री बनने के बाद उन्होंने सबको समेट कर रख दिया।


तमाम सपाइयों के आर्थिक लाभ का जरिया भले ही गायत्री प्रसाद प्रजापति बने हों लेकिन उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा दिल में ही दफन हो गई। वर्तमान में अमेठी में समाजवादी पार्टी का यह हाल है कि न कोई गायत्री प्रसाद प्रजापति से पहले दिखता है और न दूर-दूर तक कोई बाद में। अगर सीबीआई जांच का शिकंजा बर्खास्त मंत्री पर कसा तो कई स्थानीय सपाई भी इसकी जद में होंगे। ऐसे में जाहिर तौर पर अगर गायत्री के खिलाफ समाजवादी पार्टी ने और कड़ा रुख अख्तियार करते हुए उन्हें टिकट से वंचित किया तो कद्दावर विकल्प देना आसान नहीं होगा। गायत्री के मंत्री रहते चाहे कांग्रेस रही हो या फिर भाजपा और बसपा के नेता की आवाज नक्कारखाने में तूती ही साबित हुई।

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