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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Sultanpur News ›   Amethi duped in name of making Industrial Hub

इंडस्ट्रियल हब बनाने के नाम पर छली गई अमेठी

Sun, 30 Aug 2015 10:25 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/अमेठी
अमर उजाला ब्यूरो/अमेठी Updated Sun, 30 Aug 2015 10:25 PM IST
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गरीबी और बेरोजगारी से निजात पाने के लिए 80 के दशक में अपनी जमीनें यूपीएसआईडीसी के हवाले करने वाले जिले के किसान खाली हाथ रह गए। इंडस्ट्री डिपार्टमेंट के आंकड़ों को आधार मानें तो जिले के विभिन्न हिस्सों को इंडस्ट्रियल हब के रूप में विकसित करने के लिए निगम ने किसानों से जमीनें तो ले लीं लेकिन उद्योग धंधे चल सकें इस दिशा में कोई काम नहीं किया। यूपीएसआईडीसी की उदासीनता को इस बात से भी समझा जा सकता है कि किसानों से ली गई एक तिहाई भूमि अब भी निगम के पास निष्प्रयोज्य पड़ी है।

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अमेठी के किसानों को ऊसर बंजर भूमि की अच्छी कीमत के साथ रोजगार मिल सके इसके लिए 80 के दशक में बड़ी कवायद शुरू हुई थी। इसका सिलसिला संजय गांधी की मौत के बाद वर्ष 1981 में राजीव गांधी के पहली बार अमेठी से सांसद चुने जाने के साथ ही हो गया था। हालांकि इसमें तेजी तब आई जब 1984 में राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। अमेठी को विकसित किया जा सके इसके लिए राजीव के नेतृत्व वाली सरकार ने ठोस काम किए।
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 केंद्र सरकार की कोशिशों को मुकाम तक पहुंचाया जा सके और उद्योग-धंधों के लिए भूमि मिल सके इसके लिए यूपीएसआईडीसी ने वर्ष 1980 से 1988 के बीच मुसाफिरखाना तहसील क्षेत्र के जगदीशपुर, उतेलवा और कमरौली तथा गौरीगंज तहसील के टिकरिया व कौहार और अमेठी तहसील के त्रिसुंडी गांव में औद्योगिक क्षेत्र स्थापित किया। इसके लिए निगम ने कुल 3704.21 एकड़ जमीन का अधिग्रहण/पुनर्ग्रहण किया।
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 आंकड़ों को मानें तो उद्योग-धंधे लगाने के लिए इस क्षेत्र की जमीनें उद्योगपतियों की पहली पसंद होने के बावजूद निगम ने सिर्फ उतनी ही जमीन को विकसित किया जितनी भूमि के लिए उनकी लीज फाइनल हुई। निगम की उदासीनता को इस बात से भी समझा जा सकता है कि औद्योगिक गतिविधियां विकसित करने के लिए किसानों से ली गई जमीन का एक तिहाई हिस्सा अब भी खाली पड़ा है। आंकड़े बताते हैं कि निगम की ओर से ली गई कुल जमीन में मात्र 2537.91 एकड़ भूमि ही विकसित हो सकी। शेष 1166.03 एकड़ भूमि तीन दशक बाद भी विकसित नहीं की गई। अधिग्रहण के बावजूद इन जमीनों पर इंडस्ट्री नहीं लगने से वे किसान अब भी खाली हाथ हैं जिन्होंने रोजगार की उम्मीद में अपनी जमीन निगम को दी थी।

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