नासमझी

Lucknow Bureau Updated Fri, 10 Nov 2017 10:34 PM IST
पुआल से उत्सर्जित गैसें पर्यावरण के लिए घातक
क्रासर

रोकथाम के लिए प्रशासन भी नहीं ले रहा रुचि
फोटो संख्या-2
अमर उजाला ब्यूरो
धनपतगंज (सुल्तानपुर)। खेतों में धान की पुआल जलाने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति क्षीण होती जा रही है। किसानों की नासमझी भरा कदम पर्यावरण पर संकट खड़ा कर रहा है। आग की गरमी से बिगड़ती माटी की संरचना के चलते भूमि अनुपजाऊ हो जाएगी।
फसल वेस्टेज को खेतों में जलाने पर लगा सरकारी प्रतिबंध बेअसर साबित हो रहा है। खेतों मे पुआल जलाने की परंपरा खत्म नहीं हो रही है। इसका परिणाम फसलों की कम पैदावार तथा उसमें बढ़ते रोगों के रूप में साफ तौर पर नजर आने लगा है। कृषि वैज्ञानिक अचानक बढ़ते कोहरे के एक बड़े कारण के रूप में फसल वेस्टेज का खेतों में जलाया जाना भी मान रहे हैं। वैज्ञानिकों की मानें तो खेतों में पुआल जलने से मृदा की संरचना सर्वाधिक प्रभावित होती है। इससे ऊसर के बढ़ने और मृदा के भीतर जीवाश्म के मरने पर मिट्टी की उर्वरा शक्ति तेजी के साथ घटती है। जलते पुआल से उत्सर्जित होने वाली विषैली गैसों से पर्यावरण प्रभावित होता है। हालांकि इन तमाम नुकसानों के मद्देनजर सरकार ने पुआल को खेतों में जलाए जाने पर प्रतिबंध लगाया है। इसके बाद भी पुआल का खेतों में जलाए जाने का किसानों की नासमझी भरा सिलसिला थम नहीं रहा है।

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