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Sonebhadra News: वारिस की तलाश में रह जाते हैं लावारिस, साल दर साल बढ़ रही संख्या

Sat, 26 Oct 2024 12:59 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sat, 26 Oct 2024 12:59 AM IST
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Those left unclaimed in search of heir, number increasing year by year
सोनभद्र। जिला अज्ञात लाशों का डंपिंग ग्राउंड बनता जा रहा है। स्थिति यह है कि जिले में साल दर साल लावारिस शव मिलने के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है। इसमें काफी संख्या में संदिग्ध परिस्थितियों में मिले शव भी शामिल होते हैं। कुछ चुनिंदा मामलों को छोड़ दें ज्यादातर मामलों में मृतकों की पहचान नहीं हो पाती है। आकड़ों के अनुसार जिले में जनवरी 2022 से अब तक करीब 34 महीने में 146 लावारिस शवों का पोस्टमार्टम कराया गया है।
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अति पिछड़े जिले की भौगोलिक परिस्थितियां चुनौती पूर्ण हैं। जिले में आए दिन लावारिस लाश मिलना आम बात हो गई है। महिला या पुरुष के शव को दूर-दूर तक पहचानने वाला कोई नहीं होता। आकड़ों के अनुसार जिले में जनवरी 2022 से अब तक करीब 34 महीने में 146 लावारिस शवों का पोस्टमार्टम कराया। यह संख्या साल दर साल बढ़ती ही जा रही है। आकड़ों को देखे तो वर्ष 2022 में कुल 40 लावारिश शवों का पोस्टमार्टम हुआ। जबकि 2023 में 47, वहीं 2024 में अब तक 59 लावारिस शवों का पीएम कराया गया है। इसमें नदी, नाला, नहर, रेलवे ट्रैक, चौराहों और झाड़ी आदि में पाई जाने वाली लाशों के साथ ही सड़क हादसे में घायल लावारिस या बीमारी से मरने वाले लावारिस और मानसिक रोगियों सहित अन्य के शव शामिल रहते हैं। सूचना पर ऐसे लावारिस शवों को पुलिस पोस्टमार्टम के लिए भेज देती है। पहचान न होने पर 72 घंटे बाद शव की फोटो खिंचवाकर अंतिम संस्कार कर दिया जाता है। कई मामलों में शिनाख्त न होने के चलते फाइल भी बंद हो जाती है। साथ ही घटना के पीछे के रहस्य का खुलासा भी नहीं हो पाता है। हालांकि ऐसे मामले जो गंभीर होते हैं, उनमें तथ्यों के मद्देनजर पुलिस लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करने के बाद डीएनएन के लिए सैंपल सुरक्षित रखती है।
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इलाज के अभाव में मरने वाले भी शामिल

लावारिस मौतों के मामले में मेडिकल काॅलेज से संबद्ध जिला अस्पताल में मरने वाले मरीज भी शामिल हैं। इन्हें घायल होने या अचेत अवस्था में मिलने पर एंबुलेंस कर्मी जिला अस्पताल पहुंचा देते हैं। इन्हें बेहतर उपचार की जरूरत होती है। मगर चिकित्सकों के रुचि न लेने के कारण ये दम तोड़ देते हैं।
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सोशल मीडिया बन सकता है सहारा
जिले में मिले लावारिस शवों की पहचान कराने के लिए पुलिस को काफी परेशानी से जूझना पड़ता है। पूर्व के निर्देशों पर गौर करें तो इसके लिए सोशल मीडिया का व्यापक तौर पर पहचान के लिए उपयोग होना था। हालांकि पहले ही कार्यों के बोझ से दबे पुलिस कर्मी इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाते हैं। कई मामलों में मानसिक रोगियों की पहचान होने के बाद भी परिजन उनका शव नहीं लेते हैं। उनका अंतिम संस्कार भी पुलिस को कराना होता है।
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अंतिम संस्कार के लिए मिलते हैं 3400 रुपये
जिले में लावारिस शवों की पहचान न हो पाने पर कफन और अंतिम संस्कार करने का जिम्मा पुलिस का ही होता है। कई बार शव इतनी खराब हालत में होते हैं कि बदबू आती है। पुलिस को अंतिम संस्कार के लिए 3400 रुपये मिलते हैं। यह रकम थानेदार की संस्तुति के बाद ही पुलिस लाइंस में प्रक्रिया पूरी कराने पर हासिल हो पाती है। इसमें भी कई बार कागजी प्रक्रिया टेढ़ी होती है। इसमें लकड़ी, वाहन का बिल जुटाना आसान नहीं होता है। लंबी प्रक्रिया के कारण कई बार पुलिस कर्मी आवेदन तक नहीं करते। कई बार जब तक यह पैसा मिलता है, पुलिसकर्मी थाना क्षेत्र से दूर जा चुके होते हैं।
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पुलिस अपनाती है यह प्रक्रिया
सड़क दुर्घटना और बीमारी से मरने वालों को छोड़ दें तो पुलिस रिकार्ड में वर्ष 2023 में कुल 16 शव बरामद हुए थे। इसमें से तीन शवों की शिनाख्त हुई थी, जबकि 2024 में कुल 12 अज्ञात शव बरामद हुए हैं। इसमें से दो की पहचान हुई थी। विभाग की ओर से निर्देश पर गौर करें तो अज्ञात शव की सूचना पर थाने के रोजनामचा में दर्ज कर थाना प्रभारी को खुद घटनास्थल पर पहुंच फॉरेंसिक टीम को बुलाकर साक्ष्य एकत्र कराना होता है। कपड़ों के साथ ही कागजात, टैटू और निशान, चोट पर विशेष ध्यान देना होता है। इनकी पहचान के लिए उसकी फोटो और विवरण डीसीआरबी और तिनेत्र पोर्टल के जरिए आसपास के जनपदों के थानों से लेकर अन्य जिलों और सीमावर्ती राज्यों में भेजा जाता है।

वर्ष 2023 और 2024 में कुल 28 अज्ञात शव बरामद हुए थे। इसमें से पांच की शिनाख्त हुई थी। अज्ञात शव बरामद होने पर उसकी पहचान और रिकाॅर्ड के लिए विवरण सीसीटीएनएस के फार्म आईआईएफ-10 में अपलोड करने के निर्देश दिए गए हैं। सभी थाना प्रभारियों को लावारिस शवों की पहचान और मौतों की जांच को लेकर निर्देश दिए गए हैं। -डॉ. अशोक कुमार मीणा, एसपी सोनभद्र।
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