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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Sonebhadra News ›   There is a unique temple of Shiva in Gupta Kashi, you would not have seen such a rare statue

Sawan Special: हल चलाने के दौरान जमीन में मिली थी ये प्रतिमा, यहां शिवलिंग नहीं शिव-पार्वती की होती है पूजा

Wed, 19 Jul 2023 08:52 AM IST
किरन रौतेला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सोनभद्र
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सोनभद्र Published by: किरन रौतेला Updated Wed, 19 Jul 2023 08:52 AM IST
सार

जिला मुख्यालय सोनभद्र से 39 मिमी किलोमीटर दूर स्थित सतवारी गांव में शिवद्वार मंदिर ऐतिहासिक महत्व वाला है। किंवदंतियों के अनुसार खेत में हल जोतते समय यह दिव्य प्रतिमा मोती महतो को प्राप्त हुई थी। उसने वहां पर मंदिर बनवाकर मूर्तियों को स्थापित कराया।

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There is a unique temple of Shiva in Gupta Kashi, you would not have seen such a rare statue
शिवद्वार उमा-महेश्वर मंदिर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

देवों के देव कहलाने वाले महादेव के देश में कई ऐसे पावन धाम हैं, जहां पर सिर्फ दर्शन मात्र से ही शिव भक्तों के सारे दु:ख-दर्द दूर और मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। काशी से सटे इस जिले में भी ऐसा ही एक मंदिर है। खास बात यह कि यहां शिवलिंग की नहीं, साक्षात शिव-पार्वती की पूजा होती है। काले पत्थर से निर्मित शिव-पार्वती की ऐसी प्रतिमा है, जो अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगी। साढ़े चार फीट ऊंची लश्या शैली की प्रतिमा को सृजन का स्वरूप भी माना जाता है। यह प्रतिमा खेत में हल चलाने के दौरान जमीन में मिली थी। इस क्षेत्र के निवासी इस मंदिर को धार्मिक महत्व के कारण दूसरी काशी व गुप्त काशी के रूप में मानते हैं। यही कारण है कि यहां बड़ी तादाद में श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। सावन के सोमवार को तो हजारों की भीड़ उमड़ती है। 

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खेत मे मिली थी प्रतिमा
जिला मुख्यालय सोनभद्र से 39 मिमी किलोमीटर दूर स्थित सतवारी गांव में शिवद्वार मंदिर ऐतिहासिक महत्व वाला है। किंवदंतियों के अनुसार खेत में हल जोतते समय यह दिव्य प्रतिमा मोती महतो को प्राप्त हुई थी। उसने वहां पर मंदिर बनवाकर मूर्तियों को स्थापित कराया। इतिहासकारों के मुताबिक यह प्रतिमा 11वीं सदी की है। यह मंदिर उस काल के शिल्प कौशल के बेहतरीन नमूने और शानदार कला का प्रदर्शन करता है। 
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There is a unique temple of Shiva in Gupta Kashi, you would not have seen such a rare statue
शिवद्वार उमा-महेश्वर मंदिर - फोटो : अमर उजाला

दर्शन कर निहाल होते हैं भक्त
उमामहेश्वर की यह दिव्य प्रतिमा को देखने पर मन सम्मोहित हो जाता है और अपलक निहारने का मन करता है। त्रिनेत्रधारी की जटाओं, बाहों व गले में रुद्राक्ष, कानों में बिच्छुओं का कुंडल, गले में नागदेव का कंठहार, मस्तक पर अर्धचंद्र, हाथों में त्रिशूल व डमरू, जटाओं के बीच मां गंगा की दिव्य धारा, कटि प्रदेश में बाघंबर बेहद कुशलता व बारीकी से शिल्पकार द्वारा गढ़ा गया है। साढ़े चार फीट की काले पत्थर की इस मूर्ति में भगवान शिव के बाएं जंघे पर बैठी मां पार्वती के बाएं हाथ में दर्पण सुशोभित है। मां ने अपना बायां हाथ शिवशंकर के कंधे पर रखा है। प्रतिमा में भगवान शिव को चतुर्भुजी दर्शाया गया है। प्रतिमा में भगवान गणेश, कार्तिकेय व अन्य देवी देवताओं की नयनाभिराम मूर्तियां भी गढ़ी गई हैं। भगवान शिव व माता पार्वती के मंद मंद मुस्कान का आभास कराते पतले पतले अधर शिल्पकार की विलक्षण प्रतिभा को दर्शाते हैं। इस अद्वितीय मूर्ति को देखकर आभास होता है कि शिव पार्वती एक दूसरे के दिव्य व अनंत रूप को अपलक निहार रहे हैं।
 

There is a unique temple of Shiva in Gupta Kashi, you would not have seen such a rare statue
शिवद्वार उमा-महेश्वर मंदिर - फोटो : अमर उजाला

13 लाेगों से शुरू हुई थी कांवड़ यात्रा, आज हजारों में आते हैं कांवड़िए
शिवद्वार में कांवड़ यात्रा का शुभारंभ सन 1986 में हुआ। नगर के कुछ प्रबुद्धजनों ने विचार विमर्श कर इस कांवड़ यात्रा का बीजारोपण किया। सर्वप्रथम डाक्टर सुग्रीव पांडे बच्चा, वीरेंद्र गुप्ता, घनश्याम दास केडिया, द्वारिका प्रसाद खेमका, माताप्रसाद रौनियार, लवकुश उमर, विजय उमर, सरजू विश्वकर्मा, श्यामा विश्वकर्मा, सुनील उमर, हरिदास पटेल समेत तेरह श्रद्धालुओं ने मिर्ज़ापुर में गंगा नदी के बरिया घाट से रविवार को कांवड़ में गंगाजल भरकर 67 किलोमीटर की कठिन यात्रा पूर्ण कर श्रावण मास के अंतिम सोमवार को शिवद्वार स्थित शिवमंदिर में भगवान शिवशंकर का जलाभिषेक किया। दर्जन भर कांवड़ यात्रियों द्वारा शुरू की गई यह पवित्र यात्रा आज वटवृक्ष का रूप धारण कर चुका है औऱ हजारों की संख्या में कांवड़िया भगवान आशुतोष का श्रावण मास में जलाभिषेक करते हैं। कालांतर में विजय गढ़ स्थित रामसरोवर से भी जल भरकर कांवड़ यात्रा प्रारंभ की गई।

कई राज्यों से आते हैं श्रद्धालु
शिवद्वार मंदिर के मुख्य पुजारी सुरेश गिरि ने बताया कि यहां दर्शन पूजन करने वाले भक्तों की भगवान शिवशंकर हर मनोकामना पूर्ण करते हैं और मनोवांछित फल प्रदान करते हैं।यहां उत्तर प्रदेश के विभिन्न इलाकों के साथ ही मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, दिल्ली समेत विभिन्न स्थानों से भक्तगण उमामहेश्वर की दिव्य प्रतिमा का दर्शन करने आते हैं।श्रावण मास में यहां एक महीने का मेला लगता है, जिसमें हजारों कांवड़िए भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं। महाशिवरात्रि और वसंत पंचमी के पर्व पर भी यहां परंपरागत मेला आयोजित किया जाता है।

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