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Sonebhadra News: जिन बच्चों को हमने पाला, उन्हीं ने घर से निकाला

Sun, 01 Oct 2023 12:04 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 01 Oct 2023 12:04 AM IST
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The children whom we raised were thrown out of their homes
सोनभद्र। बच्चों को पालकर बड़ा करने वाले माता-पिता को जब बुढ़ापे में उनका सहारा न मिले तो इसकी पीड़ा अंतहीन होती है। कुछ ऐसी ही पीड़ा से जिले के कई बुजुर्ग भी जूझ रहे हैं। अपनों से ठुकराए जाने के बाद उन्होंने वृद्धाश्रम में शरण ले रखी है। वहां उनकी बेहतर देखभाल तो जरूर हो रही है, लेकिन अपनों से दूर होने का दर्द हर वक्त उन्हें सता रहा है।
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छपका में संचालित वृद्धाश्रम में रह रहे हर वृद्ध की एक अलग कहानी है। जवानी में अपना खून-पसीना लगाकर चार-पांच बच्चों का हसी-खुशी पालन करने वाले बुजुर्ग उम्र के अंतिम पड़ाव पर किसी एक का भी सहारा न मिलने से दुखी हैं। अपने संतान की हर खुशी के लिए अपना सब कुछ न्योछावर करने वाले वृद्धजन इस हाल में भी उनकी बुराई नहीं चाहते। वह जुबां से कुछ नहीं कहते, लेकिन आंखों से छलक कर बाहर आता उनका दर्द बहुत कुछ बयां करता है।
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हिस्सा पाने के लिए लड़ते हैं, देखभाल के लिए कोई नहीं
गौरी गांव निवासी रामलखन की तीन बेटियां हैं, बावजूद वह पिछले पांच साल से वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। बताते हैं कि उनके पास कुल 28 बिस्वा जमीन है। इसमें से एक तिहाई हिस्सा बड़े दामाद को दे दिया। लड़-झगड़कर हिस्सा तो ले लिया, लेकिन हमारी देखभाल के लिए तैयार नहीं है। अन्य भूमि भी बाकी दो बेटियों को बांट चुके हैं। मनमुटाव के चलते छोटी बेटी के पास नहीं जा सकते। मन बहलाने के लिए कभी-कभी मझली बेटी के पास चले जाते हैं, लेकिन मन को सुकून तो वृद्धाश्रम में ही मिलता है।
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चार बेटों को हमने पाला, मेरे लिए कोई तैयार नहीं
खुटहां गांव निवासी गंगाराम के चार बेटे हैं। सभी मजदूरी कर भरण पोषण कर रहे हैं, लेकिन पिता को अपने साथ रखने के लिए कोई तैयार नहीं। बेटों को देने के बाद अपने हिस्से में आई जमीन बेचकर वह रहने के लिए पौत्री के घर गए तो वहां भी दो महीने के बाद गुजारा करना मुश्किल हो गया। लिहाजा गांव के लोगों की सलाह पर वृद्धाश्रम आ गए। उन्हें इस बात का दर्द है कि मजदूरी के बल पर ही उन्होंने चार बेटों को पालते हुए उनकी गृहस्थी बसाई, लेकिन चारों मिलकर भी उनकी देखभाल नहीं कर पा रहे।
पिता के शव को हाथ तक नहीं लगाया, देखभाल क्या करेंगी
जिगना निवासी जयपति को कोई बेटा नहीं, लेकिन दो बेटियां हैं। कई वर्षों से वह इसी वृद्धाश्रम में रह रही हैं। पति भी यहीं रहते हुए स्वर्ग सिधार गए। बताया कि पति की मौत हुई तो बेटियाें ने शव को हाथ तक नहीं लगाया। अपने पास मौजूद चांदी के आभूषण बेचकर अंतिम संस्कार किया था। ऐसे बेटियों से भला देखभाल की उम्मीद कैसे कर सकती हैं। एक नाती जरूर उनका ख्याल रखता है, लेकिन उसके माता-पिता इस बात से भी संतुष्ट नहीं। लिहाजा वह यहां पड़ी हैं।
भतीजे ने पहुंचा दिया वृद्धाश्रम
कुशीनगर के पडरौना निवासी स्वामीनाथ की कोई संतान नहीं है। भाई-भतीजा जरूर हैं, मगर उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। कुछ साल पहले सरकारी सेवा में तैनात भतीजा उन्हें यहां ले आया था। कुछ दिन साथ रखा, फिर वृद्धाश्रम में पहुंचा दिया। वैसे भी घर में कोई नहीं तो कहां जाएं, लिहाजा वृद्धाश्रम में ही रहकर दिन गुजार रहे हैं।

बेटे ने ठुकराया, आश्रम में जगह पाया
सलखन निवासी तेतरी देवी को एक बेटा और तीन बेटियां हैं। बावजूद वह वृद्धाश्रम में ही रह रही हैं। वह बेटे का जिक्र भी नहीं करना चाहतीं। उनका कहना है कि जिस बेटे की गृहस्थी बसाने के साथ उसकी दो बेटियों की शादी कराई, उसी ने उन्हें छोड़ दिया है। पति का पैर टूटा तो खेत बेचकर दवा करानी पड़ी। मदद के लिए कोई आगे नहीं आया। बेटियां हैं तो उनके सहारे भी कब तक रह सकती हूं। वृद्धाश्रम में ही उनके दिन गुजर रहे हैं।
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