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सलखन के फासिल्स से भी पुराने हैं मुर्धवा में मिले पत्थर

Tue, 18 Oct 2022 11:57 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Tue, 18 Oct 2022 11:57 PM IST
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Stones found in Murdhwa are older than the fossils of Salkhan
रेणुकूट क्षेत्र के मुर्धवा में जांच करते भू वैज्ञानिकों का दल। - फोटो : SONBHADRA
म्योरपुर। दुनिया के सबसे पुराने फासिल्स के लिए मशहूर सलखन से भी पुराने फासिल्स (जीवाश्म) रूपी पत्थर मुर्धवा क्षेत्र में भी पाए गए हैं। दुनिया के कई देशों से पहुंचे भू-वैज्ञानिकों के 65 सदस्यीय दल ने मुर्धवा, रेणुकूट व आसपास के क्षेत्रों के भ्रमण के बाद यहां मिले पत्थरों की आयु 1800 मिलियन (180 करोड़) वर्ष से भी ज्यादा होने का दावा किया है। वैज्ञानिकों के दल ने इसे संरक्षित कर गहन अध्ययन की जरूरत बताई है।
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बीएचयू के भू वैज्ञानिक प्रो. वैभव श्रीवास्तव के नेतृत्व में पहुंचे 65 सदस्यीय दल ने दो दिनों तक रुककर क्षेत्र का भ्रमण किया। मुर्धवा, जमतिहवा नाला, रनटोला, रेणुकूट के आसपास के इलाकों में मौजूद पहाड़ियों व पत्थरों के अध्ययन के बाद टीम मंगलवार को लौट गई। प्रो. वैभव श्रीवास्तव ने बताया कि मुर्धवा नाले में मौजूद गहरे स्लेटी रंग के पत्थर 180 करोड़ वर्ष पुराने हैं। उन्होंने दावा किया कि पूरे विश्व में इतने पुराने पत्थर जल्दी नहीं मिलते। इसे संरक्षित करने की जरूरत है। रनटोला से रेणुकूट तक जा रही रेलवे लाइन के समीप स्थित पहाड़ी भी हजारों वर्ष पुराना है। उन्होंने दावा किया कि यहां मौजूद पत्थर और जीवाश्म पर लंबे शोध की जरूरत है। जल्द ही इसे संरक्षित किए जाने की आवश्यकता भी है।
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चोपन से गढ़वा के बीच चल रहे रेलवे दोहरीकरण के दौरान तोड़ी गई पहाड़ी पर भू वैज्ञानिकों के दल ने काफी चिंता जताई। कहा कि इस तरह से हजारों वर्ष पुरानी पहाड़ी को नष्ट करना उचित नहीं है। मंगलवार की सुबह प्रभागीय वन अधिकारी मनमोहन मिश्र ने भी भू वैज्ञानिकों के दल से मुलाकात कर जल्द ही इसे संरक्षित करने के संबंध में आवश्यक पहल करने का भरोसा दिया। रनटोला गांव के प्रधान दिनेश जायसवाल ने भी इन पत्थरों के संरक्षण की जरूरत बताते हुए कहा कि इसके संरक्षण का पूरा प्रयास किया जाएगा।
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हजारों साल पहले समुद्र था मुर्धवा का क्षेत्र
भू वैज्ञानिक वैभव श्रीवास्तव ने दावा किया कि हजारों वर्ष पूर्व मुर्धवा का क्षेत्र समुद्र का रूप था। उसकी तलहटी में ही यह पत्थर विकसित हुए हैं। कहा कि इन पत्थरों के संरक्षण के साथ यहां शोधशाला भी बनाने की जरूरत है, ताकि अध्ययन का दायरा बढ़ाते हुए इस क्षेत्र के बारे में और भी जानकारी हासिल हो सके। मंगलवार की सुबह भू वैज्ञानिकों के दल ने रिहंद बांध पहुंच कर यहां का भी जायजा लिया और दोपहर बाद यह दल वापस लौट गया।
दल में शामिल रहे कई देशों के भू-वैज्ञानिक
अध्ययन के लिए पहुंचे 65 सदस्यीय दल में कई देशों के भू-वैैज्ञानिक शामिल रहे। इसमें फ्लोरिडा विश्वविद्यालय अमेरिका से आए प्रोफेसर नेपच्यून, ढाका विवि के प्रो. मोहम्मद शरीफ, जीएसआई कानपुर के अभिनव राय, कोलकाता के ध्रुवमुख चट्टोपाध्याय, प्रो. निखिल मंडल, प्रो. संदीप बनर्जी समेत देश के अन्य जगहों से आए प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर व शोध छात्रों का दल रहा।

140 करोड़ साल पुराने हैं सलखन के फासिल्स
जिले के सलखन में भी पुराने फासिल्स मौजूद हैं। भू-वैज्ञानिकों की टीम ने इनकी आयु करीब 140 करोड़ वर्ष आंकी है। सलखन में बड़ी मात्रा में मिले फासिल्स को संरक्षित किया गया है। अमेरिका के येलो स्टोन फासिल्स भी इसके बाद के हैं। मुर्धवा में मिले फासिल्स को भू-वैैज्ञानिकों ने 180 करोड़ वर्ष पुराना बताया है। इस लिहाज से यह फासिल्स दुनिया के सबसे पुराने फासिल्स में शामिल हो सकते हैं। फिलहाल इस पर गहन अध्ययन की जरूरत है।
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