{"_id":"621fb6b5fef1ac1a5b59cd55","slug":"sit-ups-will-have-an-effect-or-will-be-left-behind-sonbhadra-news-vns6413449170","type":"story","status":"publish","title_hn":"उठक-बैठक का होगा असर या रह जाएगी कसर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
उठक-बैठक का होगा असर या रह जाएगी कसर
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जिले की सबसे पुरानी राबर्ट्सगंज विधानसभा सीट कुछ दिन पहले तक एक आम सीट थी, मगर अब यह पूर्वांचल की हॉट सीट बन गई है। हर कोई यह जानना चाहता है कि विधायक की उठक-बैठक और तेल मालिश का मतदाताओं पर कितना असर हुआ है। वायरल वीडियो को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष की अपनी-अपनी दलीलें हैं, मगर जनता का नजरिया उनसे अलग है। फिलहाल भाजपा का गढ़ कही जाने वाली इस सीट पर पार्टी की राह आसान नजर नहीं आ रही। भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाकर हाथी बढ़त बनाने में लगा है तो सपा अपने वोटों को सहेज कर 2012 का इतिहास दोहराने की कोशिश में है।
वर्ष 1952 से लेकर अब तक हुए चुनावों पर नजर डालें तो यहां भाजपा की मजबूत पैठ रही है। 17 चुनावों में सर्वाधिक आठ बार भाजपा-जनसंघ ने जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस के हिस्से में पांच बार जीत आई। दो बार सपा और एक मर्तबा बसपा के पास रही राबर्ट्सगंज सीट पर निर्दलीय ने भी परचम लहराया है। वर्तमान विधायक भूपेश चौबे के दम पर लगातार दूसरी जीत पाने की कोशिश में जुटी भाजपा का भरोसा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और गैर यादव पिछड़ा वोट हैं। पिछले पांच वर्षों के काम गिनाकर भूपेश इन वर्गों को सहेजने में जुटे हैं। प्रत्याशी से नाराज लोगों पर मोदी मैजिक चलाया जा रहा है तो राष्ट्रवाद की दुहाई देकर वोटरों के ध्रुवीकरण की कोशिश जारी है।
भाजपा के मंसूबों को विफल करने में सपा भी पूरी शिद्दत से लगी है। चुनाव प्रचार के दौरान प्रत्याशी अविनाश कुशवाहा वर्ष 2012-17 के अपने कार्यकाल की उपलब्धि और वर्ष 2017-22 में उन परियोजनाओं की उपेक्षा का मुद्दा जोर-शोर से उठा रहे हैं। यादव, कुशवाहा, कुर्मी, मुस्लिम और वैश्य वोटों को अपने पाले में लाने के लिए उनके हितों को पूरा करने का दम भर रहे हैं। नगर के मध्य से गुजरे स्टेट हाईवे के कारण चौड़ीकरण की जद में आ रहे बाजार को बचाने के लिए बाईपास बनवाने का वादा कर रहे हैं तो अपने समय अधूरी सिंचाई परियोजनाओं को भी पूरा कराने के लिए वोट मांग रहे।
विज्ञापन
बसपा प्रत्याशी अविनाश शुक्ल ने लड़ाई को त्रिकोणीय कर रोचक मोड़ दिया है। अति पिछड़े चतरा ब्लाक में अविनाश को स्थानीय होने का लाभ मिल रहा है तो नगवां में भूपेश के विरोधी वोट उनके साथ जुड़ रहे हैं। ब्राह्मण मतों की यहां अच्छी संख्या है। बसपा के परंपरागत वोटों के साथ ब्राह्मण मतों का झुकाव हुआ तो भाजपा की राह कठिन हो जाएगी। हालांकि उन्हें यह आशंका भी है कि उनके कहीं वोटों के बिखराव का लाभ तीसरा न ले ले।
जो दल जीता, सूबे की सत्ता उसी को
राबर्ट्सगंज सीट के साथ यह मिथक भी है कि जिस दल को यहां जीत मिली, सूबे की सत्ता भी उसी के पास होती है। पिछले दो दशकों से यही स्थिति है। वर्ष 2002 में सपा, 2007 में बसपा, 2012 में सपा और फिर 2017 में भाजपा ने जीत हासिल की थी। यही कारण भी है कि राबर्ट्सगंज सीट जीतने के लिए सभी दलों ने पूरा जोर लगा दिया है।
37 वर्षों से कांग्रेस को जीत की तलाश
वर्ष 1952 के पहले चुनाव में एकतरफा जीत दर्ज करने वाली कांग्रेस को इस सीट पर अंतिम बार 1985 में जीत मिली थी। तब कल्लूराम सोनकर यहां से निर्वाचित हुए थे। 1989 के चुनाव में भाजपा के तीरथराज ने यह सीट कांग्रेस से छीनी तो फिर दोबारा कांग्रेस को मौका ही नहीं मिला। करीब 37 वर्षों से जीत को तरसती कांग्रेस ने इस बार कमलेश ओझा पर दांव लगाया है। प्रधानी से राजनीतिक शुरुआत करने वाले कमलेश को जिताने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार के कई मंत्री और विधायक यहां डेरा डाले हुए हैं।
कमजोरी और ताकत
भाजपा के भूपेश चौबे अंदरखाने में गुटबाजी से परेशान हैं। पार्टी में ही कई नेताओं से भितरघात की आशंका है। उन्हें योगी-मोदी सरकार के काम पर जीत का भरोसा है। सपा के अविनाश कुशवाहा को उम्मीद है कि सरकार और विधायक से नाराजगी का लाभ उन्हें मिलेगा, लेकिन यह चिंता भी सता रही है कि भाजपा अपने पक्ष में वोटों का ध्रुवीकरण कराने में कामयाब न हो। बसपा के अविनाश शुक्ला जातिगत समीकरणों से मजबूत हैं तो उन्हें भाजपा-सपा की सीधी लड़ाई में होने की दशा में नुकसान की आशंका है।
विज्ञापन
वर्ष 1952 से लेकर अब तक हुए चुनावों पर नजर डालें तो यहां भाजपा की मजबूत पैठ रही है। 17 चुनावों में सर्वाधिक आठ बार भाजपा-जनसंघ ने जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस के हिस्से में पांच बार जीत आई। दो बार सपा और एक मर्तबा बसपा के पास रही राबर्ट्सगंज सीट पर निर्दलीय ने भी परचम लहराया है। वर्तमान विधायक भूपेश चौबे के दम पर लगातार दूसरी जीत पाने की कोशिश में जुटी भाजपा का भरोसा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और गैर यादव पिछड़ा वोट हैं। पिछले पांच वर्षों के काम गिनाकर भूपेश इन वर्गों को सहेजने में जुटे हैं। प्रत्याशी से नाराज लोगों पर मोदी मैजिक चलाया जा रहा है तो राष्ट्रवाद की दुहाई देकर वोटरों के ध्रुवीकरण की कोशिश जारी है।
विज्ञापन
भाजपा के मंसूबों को विफल करने में सपा भी पूरी शिद्दत से लगी है। चुनाव प्रचार के दौरान प्रत्याशी अविनाश कुशवाहा वर्ष 2012-17 के अपने कार्यकाल की उपलब्धि और वर्ष 2017-22 में उन परियोजनाओं की उपेक्षा का मुद्दा जोर-शोर से उठा रहे हैं। यादव, कुशवाहा, कुर्मी, मुस्लिम और वैश्य वोटों को अपने पाले में लाने के लिए उनके हितों को पूरा करने का दम भर रहे हैं। नगर के मध्य से गुजरे स्टेट हाईवे के कारण चौड़ीकरण की जद में आ रहे बाजार को बचाने के लिए बाईपास बनवाने का वादा कर रहे हैं तो अपने समय अधूरी सिंचाई परियोजनाओं को भी पूरा कराने के लिए वोट मांग रहे।
विज्ञापन
बसपा प्रत्याशी अविनाश शुक्ल ने लड़ाई को त्रिकोणीय कर रोचक मोड़ दिया है। अति पिछड़े चतरा ब्लाक में अविनाश को स्थानीय होने का लाभ मिल रहा है तो नगवां में भूपेश के विरोधी वोट उनके साथ जुड़ रहे हैं। ब्राह्मण मतों की यहां अच्छी संख्या है। बसपा के परंपरागत वोटों के साथ ब्राह्मण मतों का झुकाव हुआ तो भाजपा की राह कठिन हो जाएगी। हालांकि उन्हें यह आशंका भी है कि उनके कहीं वोटों के बिखराव का लाभ तीसरा न ले ले।
जो दल जीता, सूबे की सत्ता उसी को
राबर्ट्सगंज सीट के साथ यह मिथक भी है कि जिस दल को यहां जीत मिली, सूबे की सत्ता भी उसी के पास होती है। पिछले दो दशकों से यही स्थिति है। वर्ष 2002 में सपा, 2007 में बसपा, 2012 में सपा और फिर 2017 में भाजपा ने जीत हासिल की थी। यही कारण भी है कि राबर्ट्सगंज सीट जीतने के लिए सभी दलों ने पूरा जोर लगा दिया है।
37 वर्षों से कांग्रेस को जीत की तलाश
वर्ष 1952 के पहले चुनाव में एकतरफा जीत दर्ज करने वाली कांग्रेस को इस सीट पर अंतिम बार 1985 में जीत मिली थी। तब कल्लूराम सोनकर यहां से निर्वाचित हुए थे। 1989 के चुनाव में भाजपा के तीरथराज ने यह सीट कांग्रेस से छीनी तो फिर दोबारा कांग्रेस को मौका ही नहीं मिला। करीब 37 वर्षों से जीत को तरसती कांग्रेस ने इस बार कमलेश ओझा पर दांव लगाया है। प्रधानी से राजनीतिक शुरुआत करने वाले कमलेश को जिताने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार के कई मंत्री और विधायक यहां डेरा डाले हुए हैं।
कमजोरी और ताकत
भाजपा के भूपेश चौबे अंदरखाने में गुटबाजी से परेशान हैं। पार्टी में ही कई नेताओं से भितरघात की आशंका है। उन्हें योगी-मोदी सरकार के काम पर जीत का भरोसा है। सपा के अविनाश कुशवाहा को उम्मीद है कि सरकार और विधायक से नाराजगी का लाभ उन्हें मिलेगा, लेकिन यह चिंता भी सता रही है कि भाजपा अपने पक्ष में वोटों का ध्रुवीकरण कराने में कामयाब न हो। बसपा के अविनाश शुक्ला जातिगत समीकरणों से मजबूत हैं तो उन्हें भाजपा-सपा की सीधी लड़ाई में होने की दशा में नुकसान की आशंका है।