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तालाब और पानी की कमी देख बायोफ्लॉक विधि से पाला मछली
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सोनभद्र। चपइल गांव निवासी संगीता को मत्स्य पालन करने का काफी शौक था, लेकिन पानी की कमी और तालाब न होने के कारण इनका शौक पूरा नहीं हो पा रहा था। तभी शिवगुरु समूह से जुड़कर बायोफ्लॉक विधि से मत्स्य पालन करना सीखा। इसके बाद इन्हें कमाई की राह आसान दिखने लगी। इनके इस प्रयास को देखकर राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन अब जिले के अन्य समूहों में भी इस विधि से मत्स्य पालन कराने की तैयारी में है।
संगीता ने अपने परिवार के सहयोग और समूह की मदद से लॉकडाउन में ही बायोफ्लॉक विधि से मत्स्य पालन किया है। बताती हैं कि यह विधि इस इलाके के लिए ठीक है। एक तो पानी की कमी आड़े नहीं आएगी और कम स्थान में भी मत्स्य पालन आसानी से हो सकेगा। बताती हैं कि इस विधि में पानी की बचत तो है ही साथ ही मछलियों के फीड की भी बचत होती है। मछली जो भी खाती है उसका 75 फीसदी वेस्ट निकालती है और वो वेस्ट उस पानी के अंदर ही रहता है और उसी वेस्ट को शुद्ध करने के लिए बायोफ्लॉक का इस्तेमाल किया जाता है। बैक्टीरिया इस वेस्ट को प्रोटीन में बदल देता है जिसे मछली खाती है।
कैसे करते हैं इस विधि से पालन
बायोफ्लॉक विधि से मत्स्य पालन के लिए सबसे पहले टैंक का निर्माण कराना होगा। टैंक ऐसा होना चाहिए जिसमें पानी बदलने के दौरान दिक्कत न हो। आसानी से पानी निकाला और भरा जा सके। इसके साथ ही ऑक्सीजन के लिए लगने वाले उपकरण भी लगाने होंगे। इसमें 24 घंटे बिजली की जरूरत होती है। इसके लिए सोलर पैनल लगाकर बिजली की कमी की पूरा किया जा सकता है। नियमित देखरेख की जरूरत होती है।
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इतना खर्च और इतनी कमाई
इस विधि से मछली पालन के लिए आमतौर पर ढाई से तीन लाख रुपये खर्च करने होते हैं। टैंक अगर बड़ा बनाएंगे तो ज्यादा खर्च आएगा। संगीता के अनुसार साठ हजार लीटर के टैंक को बनाने में उनका करीब पौने तीन लाख रुपये लगा है। इसमें छह हजार मछलियां पल रही हैं। यानी 210 दिन के बाद यह मछलियां करीब साठ क्विंटल की होंगी। इस हिसाब से जब बिक्री होगी तो 100 से 120 रुपये प्रति किलो के हिसाब से करीब छह लाख रुपये की कमाई हो सकती है।
चपईल गांव में शिवगुरु समूह से जुड़ी संगीता बायोफ्लॉक विधि से मत्स्य पालन कर रही हैं। उनका प्रयोग अभी तक सफल है। उसे देखते हुए अन्य 10 समूहों में भी मत्स्य पालन की तैयारी है। इससे कम पानी, कम जगह में भी अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। - एमजी रवि, जिला प्रबंधक, एनआरएलएम
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संगीता ने अपने परिवार के सहयोग और समूह की मदद से लॉकडाउन में ही बायोफ्लॉक विधि से मत्स्य पालन किया है। बताती हैं कि यह विधि इस इलाके के लिए ठीक है। एक तो पानी की कमी आड़े नहीं आएगी और कम स्थान में भी मत्स्य पालन आसानी से हो सकेगा। बताती हैं कि इस विधि में पानी की बचत तो है ही साथ ही मछलियों के फीड की भी बचत होती है। मछली जो भी खाती है उसका 75 फीसदी वेस्ट निकालती है और वो वेस्ट उस पानी के अंदर ही रहता है और उसी वेस्ट को शुद्ध करने के लिए बायोफ्लॉक का इस्तेमाल किया जाता है। बैक्टीरिया इस वेस्ट को प्रोटीन में बदल देता है जिसे मछली खाती है।
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कैसे करते हैं इस विधि से पालन
बायोफ्लॉक विधि से मत्स्य पालन के लिए सबसे पहले टैंक का निर्माण कराना होगा। टैंक ऐसा होना चाहिए जिसमें पानी बदलने के दौरान दिक्कत न हो। आसानी से पानी निकाला और भरा जा सके। इसके साथ ही ऑक्सीजन के लिए लगने वाले उपकरण भी लगाने होंगे। इसमें 24 घंटे बिजली की जरूरत होती है। इसके लिए सोलर पैनल लगाकर बिजली की कमी की पूरा किया जा सकता है। नियमित देखरेख की जरूरत होती है।
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इतना खर्च और इतनी कमाई
इस विधि से मछली पालन के लिए आमतौर पर ढाई से तीन लाख रुपये खर्च करने होते हैं। टैंक अगर बड़ा बनाएंगे तो ज्यादा खर्च आएगा। संगीता के अनुसार साठ हजार लीटर के टैंक को बनाने में उनका करीब पौने तीन लाख रुपये लगा है। इसमें छह हजार मछलियां पल रही हैं। यानी 210 दिन के बाद यह मछलियां करीब साठ क्विंटल की होंगी। इस हिसाब से जब बिक्री होगी तो 100 से 120 रुपये प्रति किलो के हिसाब से करीब छह लाख रुपये की कमाई हो सकती है।
चपईल गांव में शिवगुरु समूह से जुड़ी संगीता बायोफ्लॉक विधि से मत्स्य पालन कर रही हैं। उनका प्रयोग अभी तक सफल है। उसे देखते हुए अन्य 10 समूहों में भी मत्स्य पालन की तैयारी है। इससे कम पानी, कम जगह में भी अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। - एमजी रवि, जिला प्रबंधक, एनआरएलएम