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कभी जिनसे सीखी थी सियासत, अब उसी को हराने की चाहत

Sat, 19 Feb 2022 11:44 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sat, 19 Feb 2022 11:44 PM IST
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Politics was learned from whom, now the desire to defeat him
सियासत में न कोई सगा होता है और न पराया। सबकी अपनी महत्वाकांक्षा होती हैं। ऐसी ही आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए इस बार दो गुरू और दो शिष्य का परिवार आमने-सामने हैं। कभी जिसके सानिध्य में रहकर राजनीति का ककहरा सीखा था आज उसी के खिलाफ मोर्चाबंदी कर रहे हैं। एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव प्रचार को लेकर इलाके का सियासी माहौल गर्म है। लोग इस पर खूब चर्चा कर रहे हैं।
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मामला दुद्धी विधानसभा क्षेत्र का है। आदिवासी बहुल इस इलाके के दिग्गज नेताओं में रामप्यारे पनिका की गिनती होती रही है। अपने सरल स्वभाव, जुझारू और तेज तर्रार छवि के कारण लोकप्रिय रामप्यारे पनिका जिले से दुद्धी से कई दफा विधायक और फिर जिले के सांसद बने। कांग्रेस की सरकार में शीर्ष नेताओं तक उनकी सीधी पहुंच थी। आदिवासी वर्ग पर उनकी मजबूत पकड़ थी। दुद्धी सीट पर लगातार सात बार चुनाव जीतने वाले विजय सिंह गोंड को सियासत में लाने और राजनीति का ककहरा सिखाने में उनकी अहम भूमिका रही। विजय सिंह उन्हें अपना राजनीतिक गुरू भी मानते रहे हैं। संयोग है कि इस बार चुनाव में विजय सिंह गोंड सपा उम्मीदवार के रूप में मैदान में हैं तो उनके गुरु स्व. रामप्यारे पनिका की पत्नी बसंती पनिका कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं। यही नहीं इस सीट पर सपा और भाजपा के उम्मीदवारों के बीच भी कुछ ऐसे ही संबंध हैं।
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भाजपा के उम्मीदवार रामदुलार गोंड कभी विजय सिंह के करीबी होते थे। 90 के दशक में राजनीति की शुरुआत करने वाले रामदुलार अपना राजनीतिक गुरु विजय सिंह गोंड को ही मानते हैं। वर्ष 2012 के चुनाव में जब आरक्षण के चलते विजय सिंह गोंड चुनाव मैदान से बाहर हुए तब उन्होंने अपना समर्थन निर्दलीय रूबी प्रसाद को दे दिया। विजय सिंह के समर्थकों की दिन-रात मेहनत की बदौलत ही रूबी प्रसाद ने जीतकर जिले की पहली और एकमात्र महिला विधायक होने का गौरव हासिल किया। रूबी की जीत में विजय सिंह के करीबी रामदुलार गोंड ने अहम भूमिका निभाई थी। अब इस बार विजय और रामदुलार अलग-अलग दलों से आमने-सामने हैं। तीनों प्रमुख दलों के उम्मीदवार एक-दूसरे को मजबूत चुनौती भी दे रहे हैं। इस संयोग की इलाके में जोरदार चर्चा है।
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