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जहां से उठता था सियासी तूफान, अब वहां सुनसान

Mon, 17 Jan 2022 11:48 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 17 Jan 2022 11:48 PM IST
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Political storm used to rise from where, now there is deserted
राबर्ट्सगंज स्थित रामलीला मैदान। - फोटो : SONBHADRA
विधानसभा चुनाव की सरगर्मी जोर पकड़ रही है। हर दल समीकरणों को अपने पाले में करने के लिए दांव चलने में लगा हुआ है। कोरोना के बढ़ते प्रभाव के कारण इस बार चुनाव में काफी कुछ बदल गया है। आयोग ने नेताओं की रैली-सभा पर रोक लगा रखी है। रैली होगी भी तो पहले की तरह न मंच सजेंगे और न ही भीड़ जुटेगी। वर्चुअल माध्यम से ही नेता अपना संदेश जनता तक पहुंचा सकेंगे। यही कारण है कि इस बार उन मैदानों में भी सन्नाटा पसरा हुआ है, जहां से कभी सियासी तूफान उठा करते थे। जिन परिसरों में खड़े होकर नेहरू, गांधी और लोहिया ने हुंकार भरी, वह आज वीरान हैं। चुनावी माहौल में भी वहां सन्नाटा है। जैसे यह मैदान कुछ कहना चाहते हैं, अपनी गाथा सुनाना चाहते हैं। नगर के मध्य स्थित आरटीएस क्लब और रामलीला मैदान की इन्हीं बातों को हमने सुना और अब आपको सुना रहे हैं, इन मैदानों की जुबानी...।
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मैं हूं रामलीला मैदान, हर चुनाव में रहा मेरा ध्यान
मैं रामलीला मैदान हूं। कभी बेहद भव्य हुआ करता था। नगर के बीच का सबसे बड़ा मैदान था मैं। तब आसपास न तो दुकानें थीं और न ही सरकारी दफ्तर। बस मैं अकेला ही था। मेरा यह अकेलापन तब टूटता था, जब चुनावी दौरे होते थे। हर रोज सभाएं होतीं। हजारों की भीड़ जुटती। मुझसे बातें करतीं और मेरी सुनती। मेरे ही परिसर में खड़े होकर भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने सभा की थी और फिर आजादी के बाद उनकी बेटी इंदिरा आईं। जब अकाल में पूरा क्षेत्र भूख से बेहाल था तब इंदिरा जी ने यहीं गरीबों और आदिवासियों का दर्द सुना। वह भावुक हुई थीं और मदद का एलान किया था और मैं उसका साक्षी था। इमरजेंसी का दौर रहा हो या मंदिर आंदोलन का वक्त। माहौल बनाने में मैंने ही नेताओं की सबसे ज्यादा मदद की, मगर आज जैसा अहसास पहले कभी नहीं हुआ। कोरोना के असर ने मुझे फिर अकेला कर दिया है। इस चुनावी दौर में मैं वीरान हूं, सुनसान हूं...।
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मेरे परिसर में गरजे थे लोहिया और वाजपेयी
अभी कुछ दिनों पहले तक ही तो मेरे परिसर में खूब चहल-पहल थी। धार्मिक मंच सजा था। दिन-रात मंत्र गूंजते थे। बच्चों और महिलाओं को हंसते-मुस्कुराते देखकर मैं भी आनंदमय था। महायज्ञ खत्म हुआ तो आस जगी कि मेरे परिसर में फिर से रौनक लौटेगी। इस चुनावी दौर में मैं फिर गुलजार होऊंगा। पहले की तरह ही नेता मेरे परिसर से हुंकार भरेंगे। ठीक वैसे ही जैसे कभी लोहिया और वाजपेयी गरजे थे। मन में उत्साह था कि नई पीढ़ी के नए नेताओं के वादे सुनने को मिलेंगे। उनकी नेतृत्व क्षमता और जनता का समर्थन देखने को मिलेगा। चुनाव एलान के दस दिन बाद भी ऐसी कोई हलचल नहीं है। कोरोना के कारण नेताओं ने भी मुझसे मुंह मोड़ लिया है। वह वर्चुअल सभा करेंगे तो हमारी आवाज कौन सुनेगा। मन यह सोचकर मायूस है कि इस बार चुनाव में मेरा कोई योगदान नहीं होगा।

राबर्ट्सगंज स्थित आरटीएस क्लब।

राबर्ट्सगंज स्थित आरटीएस क्लब।- फोटो : SONBHADRA

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