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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Sonebhadra News ›   More than 100 ancient heritage sites will be preserved and facilities will be developed in Sonbhadra.

Sonebhadra News: सोनभद्र में 100 से ज्यादा पौराणिक धरोहरें सहेजी जाएंगी, विकसित होंगी सुविधाएं

Sat, 24 Jan 2026 01:46 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sat, 24 Jan 2026 01:46 AM IST
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More than 100 ancient heritage sites will be preserved and facilities will be developed in Sonbhadra.
सोनभद्र की धरा पर पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति की कहानी बयां करने वाली कई पौराणिक और नदी घाटी सभ्यता से जुड़ी धरोहरें हैं। इन धरोहरों को सहेजने की पहल शुरू हो गई है। सोनभद्र में 100 से अधिक स्थल ऐसे हैं जिनका जीवन उत्पत्ति से लेकर अब तक किसी न किसी कालखंड से महत्वपूर्ण जुड़ाव बना हुआ है। सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग से जुड़े प्राचीन स्थल-धरोहरों को संजोने के साथ ही पर्यटन सर्किट की दृष्टि से सुविधाएं विकसित करने की योजना बनाई जा रही है।
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सोनभद्र के रामगढ़ क्षेत्र स्थित नलराजा महादेव का संबंध सतयुग के राजा नल और दमयंती से हैं। वहीं यहां शोधदल की खोदाई में ईसा से 3000 वर्ष पूर्व यज्ञ किए जाने के प्रमाण मिल चुके हैं। कई अंग्रेज यात्रियों के वृत्तांत में भी इसका जिक्र है। घोरावल क्षेत्र के शिल्पी और कोन क्षेत्र के रामगढ़ का संबंध भगवान श्रीराम से जुड़े हाेने का दावा किया जाता है। नागयोनि के समय कागभुसुंडि को सोनभद्र में लंबे समय तक मौजूदगी का दावा है। अभी भी आदिवासी समाज सात फनधारी नागदेवता के रूप में कौवा बाबा की पूजा करता है। कौवा के नाम से जिले में कई स्थल भी मौजूद हैं। मुख्यालय क्षेत्र के कंडाकोट महादेव का संबंध कण्व ऋषि के साथ पांडवों से और कोन क्षेत्र के रामगढ़ कस्बे का नामकरण भगवान राम के वन गमन के समय किए गए ठहराव से जुड़ा बताया जाता है। इसी तरह मारकुंडी पहाड़ी के नामकरण के पीछे ऋषि मारकंडेय की तपोस्थली रहना अहम कारण है। प्राचीन समय में जब सोनभद्र के एक बड़े हिस्से में समुद्र की लहरें हिलोरे लिया करती थीं, उस समय ऋषि विश्वामित्र के यहां आगमन और तपस्या का जिक्र पाया जाता है। दावा है कि गोस्वामी तुलसीदास वाराणसी से जगन्नाथपुरी सोनभद्र होते गए थे। शिवद्वार स्थित उमा-महेश्वर के अद्भुत विग्रह का पूजन किए थे। शिवद्वार स्थित सोढ़रीगढ़ का सीधा संबंध मां शारदा के अनन्य भक्त आल्हा-उदल से बताया जाता है। चंद्रकांता दुर्ग, वीर लोरिक की महागाथा से जुड़े अगोरी दुर्ग, हड़प्पा से भी प्राचीन बेलन नदी घाटी सभ्यता का जुड़ाव सीधे सोनभद्र से है। पुराणों में गंगा-कर्मनाशा के बीच मौजूद तरुण प्रदेश का भी बड़ा हिस्सा सोनभद्र में होने की बात कही जाती है। शिव-शक्ति के साधनास्थली की पहचान रहने वाले सोनभद्र में ऐसी कई धार्मिक और पौराणिक धरोहरे हैं जिन्हें संजाेने-संवारने से न केवल पर्यटन बढ़ेगा बल्कि सोनभद्र को धार्मिक, ऐतिहासिक, पौराणिक तीनों दृष्टि से अलग पहचान मिलेगी। बीएन सिंह, डीएम ने बताया कि सोनभद्र का इतिहास सभी कालखंडों से जुड़ा हुआ है। यहां धार्मिक, ऐतिहासिक और भौगोलिक तीनों दृष्टि से अनमोल धरोहरें मौजूद हैं। इन सभी धरोहरों को सहेजने, संजाेने और संवारने का काम किया जाएगा। सभी महत्वपूर्ण स्थलों को पर्यटन सर्किट से जोड़ते हुए खास पहचान दिलाई जाएगी ताकि सोनभद्र की अमूल्य धरोहरों और संपदा को विशेष पहचान मिल सके।
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