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Sonebhadra News: कालीन को छह साल से सोनभद्र की पहचान बनने का इंतजार

Sun, 20 Oct 2024 10:39 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 20 Oct 2024 10:39 PM IST
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Kaleen has been waiting for Sonbhadra to be recognized for six years.
सोनभद्र। भदोही की तरह ही कालीन को सोनभद्र की पहचान बनाने की मंशा छह साल बाद भी सफल नहीं हो पाई है। एक जिला एक उत्पाद के तहत चयनित कालीन से जुड़ा एक भी उद्योग स्थापित कराने में विभाग नाकाम रहा है। इसके लिए कोशिश तो हुई, लेकिन उपयुक्त माहौल और संसाधनों के अभाव में सारी कवायद बेकार रही। हाल यह है कि प्रदेश सरकार की यह महत्वपूर्ण योजना जिले के लिए बेमतलब साबित हो रही है। योजना के तहत सिर्फ प्रशिक्षित कारीगर तैयार हो रहे हैं, जिन्हें काम की तलाश में दूसरे जिलों में भटकना पड़ रहा है।
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वर्ष 2018 में प्रदेश सरकार ने हर जिले के एक उत्पाद को विशेष पहचान दिलाने की पहल की थी। इसके तहत जिले के किसी एक स्थानीय उत्पाद का चयन कर उसका उत्पादन बढ़ाने, अच्छी ब्रांडिंग, मार्केटिंग के लिए अनुकूल माहौल बनाना था। स्थानीय स्थिति से बेखबर अफसरों ने सोनभद्र के लिए कालीन को चुन लिया, जबकि जिले में इसके लिए न पर्याप्त कच्चा माल उपलब्ध है और न ही कोई निर्माण इकाई। यहां तक कि तैयार माल की बिक्री व आपूर्ति के लिए भी अनुकूल साधन नहीं है। इसका असर यह रहा कि छह साल बाद भी ओडीओपी के तहत एक भी औद्योगिक इकाई की स्थापना नहीं हो पाई है। तमाम कोशिशों के बाद योजना के तहत एक-दो आवेदन स्वीकृत भी हुए तो उत्पादन के बजाए उनका कार्य भी दूसरे जगह तैयार माल की बिक्री तक सिमटा हुआ है। कालीन की बुनाई करने वाले हुनरमंद तैयार करने के लिए उद्योग विभाग की ओर से हर साल प्रशिक्षण दिया जाता है। पिछले छह साल में करीब 1100 प्रशिक्षित कारीगर तैयार किए गए हैं। उन्हें टूल किट भी प्रदान की गई लेकिन कालीन बुनाई के लिए कोई इकाई स्थापित नहीं हो पाई है।
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मिर्जापुर में बदला उत्पाद, सोनभद्र में इंतजार

कालीन का सबसे बड़ा केंद्र भदोही है। उससे सटे मिर्जापुर जिले के भी कुछ इलाकों में कालीन की बुनाई व बिक्री होती है। लिहाजा मिर्जापुर में भी कालीन को ही ओडीओपी में चयनित किया गया था, लेकिन वहां उसके लिए पर्याप्त माहौल न होने पर जनप्रतिनिधियों की पहल पर सह उत्पाद के रूप में पीतल के बर्तन भी शामिल कर लिए गए। इस बदलाव के बाद मिर्जापुर में बर्तन कारोबार से जुड़े व्यापारी ओडीओपी का लाभ भी उठा रहे हैं। इसी तर्ज पर सोनभद्र से भी उत्पाद बदलने या सह उत्पाद में सोनम धान को शामिल करने का प्रस्ताव भेजा गया था। चतरा, राॅबर्ट्सगंज, घोरावल, करमा क्षेत्र में धान का अच्छा उत्पादन होता है। इसके जुड़ने से राइस मिल सहित इस पर आधारित उद्योगों को बढ़ने का मौका मिलता, लेकिन प्रभावी पैरवी के अभाव में इसे मंजूरी नहीं मिल सकी।
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ओडीओपी के तहत कालीन चयनित है। इसे बढ़ावा देने के लिए कारीगरों का प्रशिक्षण कराकर टूल किट दी जाती है, जिससे वह अपना कारोबार शुरू कर सकें। हालांकि अभी तक कोई इकाई स्थापित नहीं हो पाई है। लोगों का रुझान न होने के कारण ही उत्पाद बदलने या कोई सह उत्पाद जोड़ने का प्रयास किया गया है। फिलहाल शासन से मंजूरी नहीं मिल पाई है। -आरपी गौतम, उपायुक्त, उद्योग एवं उद्यम प्रोत्साहन केंद्र।
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