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विस्थापितों ने मुआवजे पर जताई आपत्ति
ब्यूरो/ अमर उजाला /सोनभद्र
Updated Tue, 21 Jun 2016 10:39 PM IST
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एनसीएल की निगाही व जयंत कोयला परियोजना के विस्तार के निमित्त अधिग्रहित की जा रही भूमि से संबंधित मुआवजा राशि को लेकर प्रबंधन एवं ग्रामीणों के बीच विवाद सुलझता नजर नहीं आ रहा है। इससे कोल प्रबंधन की मुश्किलें बढ़ गई है।
नार्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) की निगाही एवं जयंत कोल परियोजनाओं के लिए मेढ़ौली गांव के किसानों की भूमि अधिग्रहित की जानी है। लेकिन ग्रामीणों की आपत्ति के चलते यह प्रकरण फिलहाल लटक गया है। नगरीय क्षेत्र के करीब स्थित मेढ़ौली के दो दर्जन भू-विस्थापितों ने सामूहिक रूप से कोल प्रबंधन एवं अधिकारियों को ज्ञापन सौंप कर कई आपत्ति की है। ग्रामीणों का कहना है कि भूमि अधिग्रहण से संबंधित अधिसूचना भारत सरकार ने सन 2000 में जारी किया। लेकिन जंगल विभाग के क्लियरेंस के अभाव में न तो मुआवजा भुगतान किया गया और ना ही प्रकरण को ट्रिब्यूनल में भेजा गया। इस मद में जारी की गई मुआवजे की राशि कोल प्रबंधन अपने पास रख लिया। इसके बाद मामला डीएम के पास गया। डीएम ने जांच समिति गठित की। जांच समिति की रिपोर्ट पर छह जून 2014 को भू-स्वामियों के पक्ष में डीएम ने निर्णय दिया। आदेश में भारत सरकार की अधिसूचना का हवाला देते हुए कहा गया कि मेढ़ौली में खनन कार्य के लिए अर्जित वन, नजूल एवं स्वामित्व की भूमि का विभाजन कर भू-स्वामियों का विवरण प्रकाशित किया जाए। सन 2000 की अधिसूचना के मुताबिक लंबित प्रकरणों के मुआवजे में ब्याज की राशि जोड़कर भुगतान कराया जाए।
अपील के बाद भी नहीं पहुंचे ग्रामीण ः कोल प्रबंधन ने ग्रामीणों से अपील किया था कि 13 जून से मुआवजे की राशि वितरित की जाएगी संबंधित उसे प्राप्त करें। लेकिन ग्रामीण राशि लेने नहीं पहुंचे ग्रामीणों का कहना है कि मुआवजे की राशि प्रबंधन के खाते में रही इसका ब्याज भी कंपनी को मिला ऐसे में ब्याज पर विस्थापितों का हक है। अब विस्थापित होने वाले परिवारों का कहना है कि मुआवजा निर्धारण वर्ष 2000 से 2016 तक मय चक्रवृद्धि ब्याज मुआवजे का भुगतान हो अथवा नए जमीन अधिग्रहण विधेयक के नियमों के तहत पैसा दिया जाए।
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नार्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) की निगाही एवं जयंत कोल परियोजनाओं के लिए मेढ़ौली गांव के किसानों की भूमि अधिग्रहित की जानी है। लेकिन ग्रामीणों की आपत्ति के चलते यह प्रकरण फिलहाल लटक गया है। नगरीय क्षेत्र के करीब स्थित मेढ़ौली के दो दर्जन भू-विस्थापितों ने सामूहिक रूप से कोल प्रबंधन एवं अधिकारियों को ज्ञापन सौंप कर कई आपत्ति की है। ग्रामीणों का कहना है कि भूमि अधिग्रहण से संबंधित अधिसूचना भारत सरकार ने सन 2000 में जारी किया। लेकिन जंगल विभाग के क्लियरेंस के अभाव में न तो मुआवजा भुगतान किया गया और ना ही प्रकरण को ट्रिब्यूनल में भेजा गया। इस मद में जारी की गई मुआवजे की राशि कोल प्रबंधन अपने पास रख लिया। इसके बाद मामला डीएम के पास गया। डीएम ने जांच समिति गठित की। जांच समिति की रिपोर्ट पर छह जून 2014 को भू-स्वामियों के पक्ष में डीएम ने निर्णय दिया। आदेश में भारत सरकार की अधिसूचना का हवाला देते हुए कहा गया कि मेढ़ौली में खनन कार्य के लिए अर्जित वन, नजूल एवं स्वामित्व की भूमि का विभाजन कर भू-स्वामियों का विवरण प्रकाशित किया जाए। सन 2000 की अधिसूचना के मुताबिक लंबित प्रकरणों के मुआवजे में ब्याज की राशि जोड़कर भुगतान कराया जाए।
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अपील के बाद भी नहीं पहुंचे ग्रामीण ः कोल प्रबंधन ने ग्रामीणों से अपील किया था कि 13 जून से मुआवजे की राशि वितरित की जाएगी संबंधित उसे प्राप्त करें। लेकिन ग्रामीण राशि लेने नहीं पहुंचे ग्रामीणों का कहना है कि मुआवजे की राशि प्रबंधन के खाते में रही इसका ब्याज भी कंपनी को मिला ऐसे में ब्याज पर विस्थापितों का हक है। अब विस्थापित होने वाले परिवारों का कहना है कि मुआवजा निर्धारण वर्ष 2000 से 2016 तक मय चक्रवृद्धि ब्याज मुआवजे का भुगतान हो अथवा नए जमीन अधिग्रहण विधेयक के नियमों के तहत पैसा दिया जाए।
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