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जापानी तकनीक से विकसित होगा वन, रोकेगा प्रदूषण

Mon, 01 Nov 2021 11:45 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 01 Nov 2021 11:45 PM IST
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Forest will be developed with Japanese technology, will prevent pollution
सोनभद्र। देश के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शुमार सोनभद्र के अनपरा-शक्तिनगर परिक्षेत्र में प्रदूषण नियंत्रण के लिए वन विभाग जापानी तकनीक का सहारा लेगा। यहां मियावाकी तकनीक से वन विकसित किया जाएगा। एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में तैयार होने वाले इस वन में ऐसे पौधे लगाए जाएंगे, जो वायु की गुणवत्ता को तेजी से सुधारने में बेहद उपयोगी हैं। इसके लिए वन विभाग ने कवायद शुरू कर दी है। इस क्षेत्र में स्थापित औद्योगिक इकाइयों की भी इसमें मदद ली जाएगी।
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एनजीटी ने देश के जिन शहरों को प्रदूषण के लिहाज से अति संवेदनशील माना है, उनमें सोनभद्र का अनपरा-शक्तिनगर परिक्षेत्र भी है। सोन नदी के दक्षिण में चोपन से शक्तिनगर तक के इस क्षेत्र में डाला, ओबरा, रेणुकूट, पिपरी, अनपरा जैसी निकाय और सैकड़ों गांव शामिल हैं। इसी क्षेत्र में बालू-गिट्टी का खनन क्षेत्र है। बिजली की तापीय परियोजनाएं, एनसीएल की खदानें, हिंडाल्को का एल्यूमीनियम कारखाना सहित कई अन्य औद्योगिक इकाइयां संचालित हैं। इनसे निकलने वाली धूल-मिट्टी और राख के कण वातावरण में घुलकर वायु की गुणवत्ता को खराब करते हैं। सर्दियों में यहां अक्सर प्रदूषण का लेबल बेहद खतरनाक श्रेणी में पहुंच जाता है। इसके मद्देनजर ही एनजीटी के निर्देश पर मुख्य सचिव ने 20 अक्तूबर से जनवरी तक के लिए इस क्षेत्र में कई कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं। सभी औद्योगिक इकाइयों व कार्यदायी संस्थाओं को वायु की गुणवत्ता बेहतर बनाए रखने के लिए जरूरी निर्देश दिए गए हैं। इस बड़े क्षेत्र में प्रदूषण की निरंतर गंभीर होती स्थिति के मद्देनजर वन विभाग ने पहल की है। विभाग ने अनपरा वन क्षेत्र में एक हेक्टेयर में मियावाकी वन विकसित करने की रुपरेखा बनाई है। इस वन में ऐसे पौधे लगाए जाएंगे, जो प्रदूषण को कम करते हुए भरपूर मात्रा में ऑक्सीजन प्रदान करें। इस तकनीक की खासियत है कि इसमें पौधे बहुत तेजी से बढ़ते हैं, जिसके कारण कम समय में ही घना वन क्षेत्र तैयार होने से लोगों को इसका लाभ जल्द ही मिलने लगेगा।
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यह है मियावाकी तकनीक
मियावाकी पद्यति के प्रणेता जापानी वनस्पति वैज्ञानिक डॉ. अकीरा मियावाकी हैं। इस पद्यति से बहुत कम समय में जंगलों को घने जंगलों में परिवर्तित किया जा सकता है। इस पद्धति में देसी प्रजाति के पौधे एक दूसरे के समीप लगाए जाते हैं, जो कम स्थान घेरने के साथ ही अन्य पौधों की वृद्धि में भी सहायक होते हैं। सघनता की वजह से यह पौधे सूर्य की रोशनी को धरती पर आने से रोकते हैं, जिससे धरती पर खरपतवार नहीं उग पाता। तीन वर्षों के बाद इन पौधों को देखभाल की आवश्यकता नहीं होती। पौधे की वृद्धि 10 गुना तेजी से होती है, जिसके परिणामस्वरूप पौधरोपण सामान्य स्थिति से 30 गुना अधिक सघन होता है। यही नहीं पौधों को लगाने के लिए जैविक खाद, भूसा, गोमूत्र आदि का मिश्रण तैयार किया जाता है। पौधों को बेहद नजदीक-नजदीक लगाने के साथ ही तैयार मिश्रण से सिंचाई की जाती है और जिन जगहों पर पौधे लगाए जाते हैं उन्हें सूखी घास से पूरी तरह ढक दिया जाता है जिससे पौधों की जड़ों में हर समय नमी बरकरार रहती है।
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कई शहरों में विकसित है मियावाकी वन
इस तकनीक में दो फीट चौड़ी और 30 फीट पट्टी में सौ से भी अधिक पौधे रोपे जा सकते हैं। कम जगह में लगे घने पौधे ऑक्सीजन बैंक की तरह काम करते हैं। इस विशेष वन में पीपल, शीशम, बरगद, नीम, बांस, सागौन आदि पौधे लगाए जाएंगे। इसमें ऑक्सीजन का उत्पादन अन्य पौधों की अपेक्षा अधिक होता है। देेसी प्रजाति के होने के कारण इन पौधों के लिए यहां का पर्यावरण भी अनुकूल होगा। भोपाल सहित देश के कई बड़े शहरों में इस तकनीक की मदद पौधे उगाए जा रहे हैं।

वायु गुणवत्ता में सुधार के लिए अनपरा-शक्तिनगर परिक्षेत्र में मियावाकी वन विकसित किया जाएगा। करीब एक हेक्टेयर क्षेत्र में यह वन स्थापित होगा। इसके लिए रुपरेखा तैयार की जा रही है। क्रिटिकल पाल्यूटेड एरिया होने के कारण यहां इस विधि से बेहद कम समय में बेहतर वन स्थापित करने में मदद मिलेगी। - मनमोहन मिश्र, डीएफओ रेणुकूट।
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